उत्तराखंड की देवभूमि में जब भी पर्यावरण संरक्षण और सामुदायिक एकजुटता की बात होगी, अल्मोड़ा के एक युवा का नाम प्रमुखता से लिया जाएगा— शंकर सिंह बिष्ट। मात्र 23 वर्ष की आयु में, शंकर ने हिमालयी पारिस्थितिकी को बचाने के लिए जो समर्पण दिखाया है, वह आज के युवाओं के लिए प्रेरणा का एक बड़ा स्रोत है। हिमालयी क्षेत्रों में एक पुरानी कहावत है— “पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी, पहाड़ के काम नहीं आती।” लेकिन अल्मोड़ा के युवा पर्यावरणविद शंकर सिंह बिष्ट ने इस धारणा को बदलने का बीड़ा उठाया है। उन्होंने जल संरक्षण को केवल एक अभियान नहीं, बल्कि एक जन-आंदोलन बना दिया है।
जन्म और पृष्ठभूमि
शंकर का जन्म अल्मोड़ा जिले के एक सुदूर गांव चनौला में हुआ। पहाड़ों की गोद में पले-बढ़े शंकर ने प्राथमिक शिक्षा अपने गांव से ही प्राप्त की और स्नातक की पढ़ाई के लिए जयपुर गए। 2020 में शिक्षा पूरी करने के बाद, उन्होंने किसी शहरी नौकरी के पीछे भागने के बजाय अपनी जड़ों की ओर लौटने और अपनी मिट्टी के कर्ज को चुकाने का संकल्प लिया।
मिशन: पंचतत्व का संतुलन
शंकर का मानना है कि जीवन का आधार पाँच तत्व हैं— जल, वायु, मृदा, आकाश और अग्नि। आज के समय में बढ़ते पर्यावरण क्षरण ने इस संतुलन को बिगाड़ दिया है। शंकर का मिशन सामुदायिक भागीदारी और पारंपरिक ज्ञान के माध्यम से इसी संतुलन को बहाल करना है।
प्रमुख उपलब्धियाँ और कार्य
1. जल और वन संरक्षण का नया मॉडल
शंकर ने रामगंगा घाटी और कुमाऊं के कई गांवों (जैसे भातकोट, खजुरानी, नाईगर) में जल संकट को दूर करने के लिए धरातल पर काम किया है।
- पारंपरिक जल स्रोतों का पुनरुद्धार: उन्होंने हिमालय की प्राचीन जल प्रणालियों— नौलों और धारों को पुनर्जीवित किया।
- चाल-खाल और खंतिया: भूजल स्तर को सुधारने के लिए उन्होंने पारंपरिक ‘चाल-खाल’ और ‘खंतिया’ (छोटे गड्ढे) का निर्माण करवाया।
- मिश्रित वन: चीड़ के जंगलों के बीच उन्होंने स्थानीय प्रजातियों के पौधे लगाए ताकि मिट्टी की नमी बनी रहे।

2. 300 किमी की रामगंगा पदयात्रा
नदी के पारिस्थितिकी तंत्र को समझने के लिए शंकर ने पश्चिमी रामगंगा के उद्गम से संगम तक 300 किलोमीटर की शोध यात्रा का नेतृत्व किया। इसमें 50 से अधिक शोधकर्ताओं और पर्यावरणविदों ने भाग लिया। इस यात्रा का उद्देश्य नदी की जैव विविधता, सांस्कृतिक महत्व और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का दस्तावेजीकरण करना था।
3. 700 किमी की पदयात्रा और वन अग्नि रोकथाम
अप्रैल 2022 में, जब उत्तराखंड के जंगल आग से धधक रहे थे, तब शंकर ने चनौला से राष्ट्रपति भवन (दिल्ली) तक 700 किमी की पैदल यात्रा की। उनकी मांग थी कि वनाग्नि की रोकथाम के लिए नीतियों को मजबूत किया जाए और इसमें स्थानीय समुदायों को सीधे जोड़ा जाए।

4. जागेश्वर के 1,000 देवदारों की रक्षा
जब सड़क चौड़ीकरण के नाम पर जागेश्वर के 1,000 से अधिक पवित्र देवदार के पेड़ों को काटने की योजना बनी, तो शंकर ने इसके खिलाफ एक बड़ा जन आंदोलन खड़ा किया। उनके शांतिपूर्ण विरोध और दृढ़ संकल्प के कारण इन पेड़ों को कटने से बचा लिया गया।
आजीविका और स्वरोजगार: ‘धुरफाट’ की पहचान
शंकर केवल प्रकृति नहीं बचा रहे, बल्कि पहाड़ों से हो रहे पलायन को रोकने के लिए सशक्त आजीविका मॉडल भी पेश कर रहे हैं:
- मशरूम उत्पादन: भातकोट में महिलाओं को मशरूम की खेती का प्रशिक्षण दिलवाया।
- हिमालयी मौन पालन (Beekeeping): पारंपरिक लकड़ी के बक्सों में शहद उत्पादन को बढ़ावा देकर ग्रामीणों की आय बढ़ाने का काम कर रहे हैं।
- धुरफाट: उन्होंने पारंपरिक हिमालयी डेयरी पहचान ‘धुरफाट’ को पुनर्जीवित किया है, जो स्थानीय खाद्य सुरक्षा और स्वावलंबन का प्रतीक है।
सम्मान और पुरस्कार

शंकर के कार्यों की गूंज शासन और प्रशासन तक भी पहुंची है:
- उत्तराखंड के मुख्यमंत्री द्वारा ‘जलदूत’ सम्मान।
- UCOST द्वारा ‘वसुंधरा अमृत सम्मान’।
- ‘मैथान रत्न’ पुरस्कार
- एक कदम पहाड़ की ओर (पर्यावरण संरक्षण हेतु) 2025-26
- सहपाठी फाउंडेशन द्वारा उनके कार्यों पर एक डॉक्यूमेंट्री का निर्माण।
शंकर सिंह बिष्ट के लिए पर्यावरण कार्य कोई पेशा नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति और आने वाली पीढ़ियों के प्रति एक जिम्मेदारी है। “रविवार प्रकृति के नाम” जैसे अभियानों के जरिए वे आज भी गांव-गांव जाकर बच्चों और युवाओं को प्रकृति से जोड़ रहे हैं।जल संरक्षण केवल गड्ढे खोदना नहीं है, यह अपनी जड़ों और संस्कृति से दोबारा जुड़ने की प्रक्रिया है। जब तक समाज पानी को अपना कर्तव्य नहीं समझेगा, तब तक संकट बना रहेगा।”





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