उत्तराखंड धरोहर संरक्षण समिति (पंजीकृत) वैशाली द्वारा सेक्टर-3 स्थित रामलीला पार्क में उत्तराखंडी कौथिग 2026 का आयोजन किया गया। ‘

उत्तराखंड कौथिग में लोकसंस्कृति के रंग, उत्तराखंड के सुप्रसिद्ध लोक गायक फौजी ललित मोहन जोशी और वरिष्ठ लोक गायिका कल्पना चौहान कार्यक्रम के मुख्य आकर्षण रहे। उनके लोकप्रिय पहाड़ी गीतों पर दर्शक देर रात तक झूमते रहे। युवा गायिका शशि पाठक, युवा गायक कमल जोशी और लोक गायक पूरन चंद्र पांडे ने भी अपनी प्रस्तुतियों से खूब तालियां बटोरीं।

प्रसिद्ध संगीतकार राजेंद्र चौहान के संगीत निर्देशन में कार्यक्रम हुए। दीप चंद्रा और मीनाक्षी चंद्रा ने नृत्य निर्देशन संभाला। समिति के सदस्यों और नन्हे कलाकारों ने छोलिया, झोड़ा और छपेली जैसे पारंपरिक लोकनृत्यों की मनमोहक प्रस्तुतियां दीं।

महोत्सव में पारंपरिक पहाड़ी व्यंजनों के स्टॉल आकर्षण का केंद्र रहे। इनमें मंडुवे की रोटी, गहत की दाल, भटट की चुड़कानी और झिंगोरे की खीर शामिल थे। उत्तराखंड के जैविक उत्पादों, पहाड़ी मसालों और हस्तशिल्प की प्रदर्शनी भी लगाई गई। पिछौड़ा और नथ जैसे पारंपरिक आभूषण भी प्रदर्शित किए गए।

गाज़ियाबाद। मानवीय संवेदना और सामाजिक सहयोग की मिसाल पेश करते हुए कुमाऊँ समाज सेवा समिति वैशाली, गाज़ियाबाद के सदस्यों एवं सहयोगकर्ताओं ने लगभग 3 वर्षीय बच्ची दीक्षा के इलाज के लिए महत्वपूर्ण आर्थिक सहायता जुटाई है।

दीक्षा पिछले लगभग चार महीनों से एम्स अस्पताल में ब्लड कैंसर का उपचार करा रही है। बीमारी के कारण उसे लगातार रक्त चढ़ाने की आवश्यकता पड़ रही है। चिकित्सकों के अनुसार उसके उपचार में अभी लगभग 7–8 महीने और लग सकते हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण लंबे उपचार का खर्च परिवार के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है।

दीक्षा के उपचार में आर्थिक सहयोग के लिए चलाए गए अभियान में उत्तराखंड कुमाऊं समाज सेवा समिति वैशाली एवं कुमाऊं सभा गाजियाबाद के सदस्यों ने आगे बढ़कर सहयोग किया और अन्य लोगों को भी इस मानवीय पहल से जोड़ने का प्रयास किया।

अभियान के अंतर्गत ₹1,10,000 का चेक तैयार किया गया है, जबकि लगभग ₹15,000 की राशि परिजनों के बैंक खाते में सीधे भेजी जा चुकी है। इस प्रकार सामूहिक प्रयासों से लगभग ₹1,25,000 की सहायता राशि जुटाई गई है।

इस सहयोग अभियान में उत्तराखंड कुमाऊं समाज सेवा समिति वैशाली एवं कुमाऊं सभा गाजियाबाद की महत्वपूर्ण भूमिका रही। विशेष रूप से सक्रिय सहयोग के लिए देव पटवाल जी, हमारी संस्था की ऐना सिंह जी तथा कुमाऊँ सभा से प्रमोद तिवारी जी का विशेष आभार व्यक्त किया गया। उन्होंने स्वयं सहयोग करने के साथ-साथ अन्य सदस्यों एवं शुभचिंतकों को भी इस नेक कार्य से जोड़कर सहायता राशि जुटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उत्तराखंड कुमाऊं समाज सेवा समिति वैशाली एवं कुमाऊं सभा गाजियाबाद ने एक बार फिर यह संदेश दिया है कि सामाजिक संस्थाओं और समाज के लोगों के सामूहिक प्रयास किसी जरूरतमंद परिवार के कठिन समय में महत्वपूर्ण सहारा बन सकते हैं।

दीक्षा के परिवार ने इस सहयोग के लिए सभी सहयोगकर्ताओं के प्रति आभार व्यक्त किया है। इस अभियान से जुड़े सभी सदस्यों, सहयोगकर्ताओं एवं शुभचिंतकों का हृदय से धन्यवाद।

ईश्वर से प्रार्थना है कि नन्ही दीक्षा शीघ्र स्वस्थ होकर अपने परिवार के बीच लौटे।

🙏कुमाऊं समाज सेवा समिति के अध्यक्ष हरीश साह जी ने सभी का धन्यवाद किया और उमीद जताई है कि संस्था के सभी मेंबर जनकल्याण के कार्यों में ऐसी तरह जरूरतमंद परिवारों की मदद के लिए आगे आयेगे । ओर सभी उत्तराखंड कुमाऊं समाज सेवा समिति एवं कुमाऊं सभा गाजियाबाद के सभी सहयोगी मेंबरों का धन्यवाद किया🌸

उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र की वादियों से उठी एक छोटी सी पहल आज सात समंदर पार अपनी धाक जमा रही है। हल्द्वानी के हल्दूचौड़ गांव की निवासी किरण जोशी ने यह साबित कर दिखाया है कि अगर इरादे बुलंद हों और सरकारी योजनाओं का सही मार्गदर्शन मिले, तो ग्रामीण महिलाएं न केवल अपना जीवन बदल सकती हैं, बल्कि पूरे समुदाय के लिए रोजगार के द्वार खोल सकती हैं।

₹30,000 का ऋण और सफलता की उड़ान

किरण ने प्रदेश सरकार की राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) योजना का लाभ उठाते हुए सहकारी बैंक से महज 30 हजार रुपये का शुरुआती ऋण लिया। इस छोटी सी पूंजी से उन्होंने ‘कालिका स्वयं सहायता समूह’ का गठन किया। शुरुआत में स्थानीय पहाड़ी व्यंजनों से काम शुरू करने वाली किरण ने आज 20 अन्य महिलाओं को जोड़कर एक सशक्त नेटवर्क खड़ा कर लिया है। वर्तमान में यह समूह सालाना 7 से 8 लाख रुपये की आय अर्जित कर रहा है।

स्थानीय स्वाद से लेकर पारंपरिक शिल्पकला तक समूह की महिलाएं शुद्ध पहाड़ी उत्पादों और शिल्प को बाजार में उतार रही हैं:

  • खान-पान उत्पाद: हर्बल टी, ग्रीन-टी, रायता मसाला, ककड़ी-मूंग दाल की बड़ी, पहाड़ी पीसी नून, सैनिक चने, मडुआ व मक्का बिस्कुट, लाल चावल, झंगोरा और जम्बू गंदारैणी।
  • पारंपरिक शिल्प व लोककला: रेशम पर ऐपण चित्रकारी, ऐपण स्टाइल के हैंडबैग और शॉल।

अमेरिका तक पहुँचा कुमाऊंनी ‘पिछौड़ा’ कुमाऊं के मांगलिक अवसरों पर पहना जाने वाला पारंपरिक परिधान ‘पिछौड़ा’ अब केवल पुराने ढर्रे तक सीमित नहीं है। किरण और उनके समूह की महिलाओं ने इसमें मोती, स्टोन वर्क और आधुनिक डिजाइन की कड़ाई का नया ट्रेंड जोड़ा है। इस प्रयोग को देहरादून, दिल्ली, लखनऊ ही नहीं बल्कि अमेरिका में रहने वाले प्रवासी भारतीयों द्वारा भी खूब सराहा जा रहा है। हाल ही में नवरात्रि उत्सव के दौरान ही समूह को 50 से अधिक स्पेशल ऑर्डर मिले।

स्थानीय जिला प्रशासन और डीएम ललित मोहन रयाल ने भी किरण की इस दूरदर्शिता और महिला सशक्तिकरण की मिसाल की सराहना की है। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स और देश भर के मेलों के माध्यम से यह ग्रामीण पहल ‘वोकल फॉर लोकल’ का जीवंत उदाहरण बन चुकी है।

1 नवंबर को होगा भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम, लोक कलाकार देंगे प्रस्तुतियां

वैशाली। उत्तराखंड धरोहर संरक्षण समिति (पंजी.) की साधारण सभा बैठक (GBM) आज वैशाली सेक्टर-05 में गरिमामय एवं सौहार्दपूर्ण वातावरण में सफलतापूर्वक संपन्न हुई। बैठक में समिति की आगामी गतिविधियों, संगठनात्मक कार्यों एवं भावी योजनाओं पर विस्तार से चर्चा की गई।

बैठक के दौरान समिति के नवनिर्वाचित एवं वर्तमान पदाधिकारियों का विशेष रूप से सम्मान किया गया। इस अवसर पर संस्था की आगामी कार्ययोजना पर चर्चा करते हुए सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि आगामी 1 नवंबर को एक भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया जाएगा।

कार्यक्रम में उत्तराखंड के सुप्रसिद्ध लोक कलाकार अपनी प्रस्तुतियां देंगे। सांस्कृतिक संध्या के माध्यम से उत्तराखंड की समृद्ध लोक संस्कृति, परंपराओं और लोक कलाओं को मंच प्रदान किया जाएगा।

बैठक के सफल समापन के बाद सभी उपस्थित पदाधिकारियों, कार्यकारिणी सदस्यों एवं सदस्यों ने सामूहिक भोज में सहभागिता की और आपसी सौहार्द एवं एकजुटता का संदेश दिया।

हरीश सिंह महरा की ‘Hills Organic’ ने पारंपरिक अनाज, GI टैग वाले उत्पादों और हर्बल उत्पादों को दी नई बाजार पहचान

हरीश सिंह महरा | ग्राम जौरासी, ब्लॉक रामगढ़, नैनीताल, उत्तराखंड- एक कदम पहाड़ की ओर

कभी रोज़गार की तलाश में पहाड़ से निकलकर नासिक की एक ऑटोमोबाइल कंपनी में नौकरी करने वाले हरीश सिंह महरा ने कोरोना काल में नौकरी छूटने के बाद वापस अपने गांव का रुख किया। यह वापसी उनके लिए केवल घर लौटना नहीं थी, बल्कि एक नई सोच और नए स्वरोजगार की शुरुआत थी।

रिवर्स पलायन के दौरान हरीश ने पहाड़ के पारंपरिक उत्पादों और स्थानीय कृषि पर शोध शुरू किया। इसी दौरान उनके मन में सवाल उठा—जब पहाड़ की मिट्टी में पारंपरिक अनाज, दालें, मसाले और जड़ी-बूटियों जैसे प्राकृतिक संसाधन मौजूद हैं, तो इन्हें बेहतर तरीके से देश-दुनिया तक क्यों न पहुंचाया जाए?

इसी सोच से जन्म हुआ ‘Hills Organic’ का।

पांच उत्पादों से शुरू हुआ सफर

हरीश ने शुरुआत महज पांच जैविक उत्पादों से की। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने स्थानीय उत्पादों की गुणवत्ता, पैकेजिंग और बाजार की जरूरतों पर लगातार काम किया।

आज Hills Organic के पोर्टफोलियो में 20 से अधिक उत्पाद शामिल हैं, जिनमें मोटे जैविक अनाज यानी श्री अन्न, GI टैग वाले उत्पाद और विभिन्न हर्बल उत्पाद प्रमुख हैं।

उनका प्रयास केवल उत्पाद बेचने तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने स्थानीय किसानों को बाजार से जोड़ने और पहाड़ में उत्पादित चीजों को बेहतर मूल्य दिलाने की दिशा में भी काम किया।

किसान की मेहनत को मिला बाजार

हरीश का मानना है कि पहाड़ के किसान के पास उत्पादन की क्षमता है, लेकिन उचित बाजार, ब्रांडिंग और पैकेजिंग की कमी उसकी सबसे बड़ी चुनौती है।

Hills Organic के माध्यम से स्थानीय कृषि उत्पादों को एक पहचान देने का प्रयास किया गया। इससे किसानों को अपने उत्पादों का बेहतर मूल्य मिलने की संभावना बढ़ी और स्थानीय स्तर पर स्वरोजगार के अवसर भी तैयार हुए।

उनके अनुसार, इस पहल से जुड़े किसानों की आय में वृद्धि हुई है और गांव से होने वाले पलायन को कम करने में भी मदद मिली है।

कोरोना ने बदली सोच, पहाड़ बना कर्मभूमि

कोरोना काल ने जहां पूरी दुनिया को स्वास्थ्य और भोजन की गुणवत्ता पर सोचने के लिए मजबूर किया, वहीं हरीश के लिए यह समय एक नए संकल्प की शुरुआत बना।

उन्होंने महसूस किया कि पारंपरिक और प्राकृतिक खाद्य उत्पादों को आधुनिक बाजार से जोड़कर पहाड़ की अर्थव्यवस्था को मजबूत किया जा सकता है। इसी विचार को उन्होंने अपने उद्यम का आधार बनाया।

हालांकि जैविक या हर्बल उत्पादों को किसी बीमारी का इलाज या कोरोना जैसी बीमारी से बचाव का प्रमाणित साधन बताना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं है। Hills Organic की मूल भावना स्थानीय, पारंपरिक और प्राकृतिक उत्पादों को बाजार तक पहुंचाने की है।

सम्मान ने बढ़ाया हौसला

हरीश सिंह महरा की इस पहल को दिसंबर 2025 में उत्तराखंड सरकार द्वारा रिवर्स पलायन के क्षेत्र में सम्मानित किया गया। यह सम्मान उनके लिए केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि पहाड़ लौटकर स्वरोजगार खड़ा करने की सोच को मिला प्रोत्साहन है।

हरीश की कहानी उन युवाओं के लिए संदेश है जो रोजगार के लिए पहाड़ छोड़ने को मजबूर होते हैं। उनका सफर बताता है कि यदि स्थानीय संसाधनों, आधुनिक बाजार और उद्यमिता को एक साथ जोड़ा जाए तो पहाड़ में रहकर भी रोजगार और व्यवसाय के नए रास्ते बनाए जा सकते हैं।

एक पैकेट, पहाड़ की पूरी कहानी

Hills Organic का उद्देश्य केवल जैविक उत्पादों को बाजार तक पहुंचाना नहीं, बल्कि पहाड़ की कृषि, किसानों की मेहनत और स्थानीय संस्कृति को एक ब्रांड पहचान देना है।

Authentic Himalayan Products | Naturally Sourced | Supporting Local Farmers | Inspired by Uttarakhand

दूसरे राज्यों से पौधे लाने से लेकर पहाड़ में ही उन्नत पौध तैयार करने की ओर

मन्नू धामी की कृषि नवाचार और स्वरोजगार की प्रेरणादायक कहानी

मन्नू धामी | ग्राम द्वलिसेरा, विकासखंड कनालीछीना, जनपद पिथौरागढ़

उत्तराखंड के पहाड़ों में स्वरोजगार की संभावनाओं को तलाशते हुए मन्नू धामी पिछले पांच वर्षों से अपने गांव में रहकर फल उत्पादन, कृषि नवाचार और मत्स्य पालन के क्षेत्र में निरंतर नए प्रयोग कर रहे हैं। उनका प्रयास केवल अपनी आजीविका तक सीमित नहीं है, बल्कि पहाड़ में नई फल किस्मों को बढ़ावा देने और भविष्य में स्थानीय स्तर पर उन्नत पौध उपलब्ध कराने की दिशा में भी आगे बढ़ रहा है।

आज मन्नू धामी 135 से अधिक देशी-विदेशी आम की किस्मों तथा 300 से अधिक विभिन्न फल किस्मों पर काम कर रहे हैं। सीमित कृषि भूमि वाले पर्वतीय क्षेत्रों में इतनी अधिक फल विविधता को विकसित करना अपने आप में एक प्रयोग है।

दूसरे राज्यों से पौधे लाने की जरूरत कम करने का लक्ष्य

मन्नू धामी बताते हैं कि वर्तमान में कई कीमती और उन्नत फल पौधों के लिए उन्हें भारत के अलग-अलग राज्यों पर निर्भर रहना पड़ता है। उनका लक्ष्य है कि आने वाले समय में विदेशी और उन्नत फल किस्मों की गुणवत्तापूर्ण पौध उत्तराखंड में ही तैयार की जा सके, ताकि पहाड़ के किसानों को नई किस्मों के पौधों के लिए दूसरे राज्यों का रुख न करना पड़े।

उनकी सोच स्पष्ट है—

“आज हम दूसरे राज्यों से पौधे लेकर आ रहे हैं, कल पहाड़ में ही उन्नत पौध तैयार करके दूसरों तक पहुंचाएंगे।”

यह पहल भविष्य में स्थानीय किसानों, बागवानों और युवाओं के लिए नई संभावनाएं पैदा कर सकती है।

विदेशी फल किस्मों का पहाड़ में परीक्षण

मन्नू धामी के यहां कई नई और उन्नत फल प्रजातियों का ट्रायल भी चल रहा है। इनमें—

  • लोगान (Longan) की 4 किस्में
  • मैकेडामिया नट (Macadamia Nut)
  • रामबुटान (Rambutan)
  • एवोकाडो (Avocado)

मन्नू धामी के अनुसार इन प्रजातियों के परीक्षण में अब तक अच्छे और उत्साहजनक परिणाम देखने को मिल रहे हैं। हालांकि इन फसलों की स्थानीय जलवायु में दीर्घकालिक सफलता और व्यावसायिक संभावनाओं का आकलन लगातार परीक्षण और वैज्ञानिक निगरानी के आधार पर किया जाना जरूरी है।

कम जमीन, ज्यादा किस्में—नवाचार की नई सोच

पर्वतीय क्षेत्रों में खेती की एक बड़ी चुनौती सीमित कृषि भूमि है। बहुत से किसान नई-नई फल किस्में लगाना चाहते हैं, लेकिन जमीन कम होने के कारण वे प्रत्येक किस्म के लिए अलग-अलग पेड़ नहीं लगा पाते।

मन्नू धामी ने इसी समस्या को एक अवसर के रूप में देखा।

उनका प्रयास है कि एक ही पेड़ पर कई अलग-अलग किस्मों को विकसित करके कम जगह में अधिक फल विविधता उपलब्ध कराई जा सके।

एक पेड़ पर 7 प्रकार के अमरूद

मन्नू धामी ने एक ही पेड़ पर 7 अलग-अलग प्रकार के अमरूद की किस्में तैयार की हैं, जो वर्तमान में फल भी दे रहा है।

यह प्रयोग सीमित भूमि वाले किसानों के लिए एक नई संभावना प्रस्तुत करता है। यदि एक ही पेड़ पर कई किस्मों को सफलतापूर्वक विकसित किया जा सके, तो छोटी जमीन में भी फल विविधता को बढ़ाया जा सकता है।

एक पेड़ पर 4 बौनी आम की किस्में

इसी दिशा में मन्नू धामी ने एक ही पेड़ पर आम की 4 बौनी किस्मों को भी विकसित किया है।

उनका उद्देश्य ऐसी बहुकिस्मीय संरचना तैयार करना है, जिसमें एक ही पेड़ की अलग-अलग शाखाओं पर अलग-अलग किस्मों के आम लग सकें। इन किस्मों में अलग-अलग रंग, स्वाद और विशेषताएं देखने को मिल सकती हैं।

यह प्रयोग अभी विकास और परीक्षण के चरण में है, लेकिन सफल होने पर यह कम जमीन वाले किसानों के लिए फल विविधता का एक रोचक मॉडल बन सकता है।

फल उत्पादन के साथ मत्स्य पालन

मन्नू धामी ने स्वरोजगार के लिए केवल फल उत्पादन पर निर्भर रहने के बजाय मत्स्य पालन को भी अपने मॉडल का हिस्सा बनाया है।

वर्तमान में उनके यहां 5 टैंकों में मछली पालन किया जा रहा है, जबकि 7 अतिरिक्त टैंकों का कार्य प्रगति पर है।

इस तरह फल उत्पादन और मत्स्य पालन को साथ लेकर वह ग्रामीण क्षेत्र में बहुआयामी स्वरोजगार मॉडल विकसित करने की दिशा में काम कर रहे हैं।

पहाड़ में रोजगार की संभावनाएं पैदा करने की सोच

मन्नू धामी का प्रयास यह दिखाता है कि पहाड़ में सीमित संसाधनों के बावजूद यदि सोच में नवाचार हो, तो स्वरोजगार के नए रास्ते बनाए जा सकते हैं।

उनकी कोशिश है कि पहाड़ के किसानों को—

नई फल किस्में,
उन्नत पौध,
बहुकिस्मीय पौध तैयार करने की तकनीक
और स्थानीय स्तर पर स्वरोजगार के अवसर

उपलब्ध हो सकें।

उनका सपना केवल अपने बगीचे तक सीमित नहीं है। वह चाहते हैं कि भविष्य में उनके प्रयोगों से तैयार पौध और अनुभव दूसरे किसानों तक भी पहुंचे।

जमीन कम है तो सोच बड़ी होनी चाहिए

मन्नू धामी की कहानी एक महत्वपूर्ण संदेश देती है—

“कम जमीन का मतलब कम अवसर नहीं है। नई तकनीक, प्रयोग और सही योजना के साथ छोटी जमीन पर भी विविधता और स्वरोजगार के नए रास्ते बनाए जा सकते हैं।”

उनका यह प्रयास “एक कदम पहाड़ की ओर” की उस सोच से जुड़ता है, जिसमें पहाड़ की जमीन, पहाड़ के संसाधन और पहाड़ की युवा शक्ति को जोड़कर स्वरोजगार से स्वावलंबन की ओर बढ़ने का लक्ष्य है।

आज पौधे बाहर से, कल पौध पहाड़ से

मन्नू धामी के प्रयास का सबसे महत्वपूर्ण पहलू उनका भविष्य का लक्ष्य है।

आज उत्तराखंड के किसान नई और उन्नत किस्मों के पौधों के लिए दूसरे राज्यों की ओर देखते हैं।
कल यही पहाड़ उन्नत पौध तैयार कर दूसरे किसानों तक पहुंचाने की क्षमता विकसित करे—यही मन्नू धामी का सपना है।

यदि उनके प्रयोग वैज्ञानिक परीक्षण, स्थानीय जलवायु के अनुकूलन और गुणवत्तापूर्ण पौध उत्पादन के साथ आगे बढ़ते हैं, तो यह पहल भविष्य में पर्वतीय कृषि और बागवानी के क्षेत्र में एक उपयोगी उदाहरण बन सकती है।

एक कदम पहाड़ की ओर

“पहाड़ की जमीन पर नवाचार, गांव में रोजगार,
स्थानीय स्तर पर उन्नत पौध— और स्वरोजगार से स्वावलंबन।”


हिमालय को भारत और दक्षिण एशिया की जीवनरेखा कहा जाता है। यही हिमालय नदियों को जन्म देता है, करोड़ों लोगों को जल उपलब्ध कराता है और एक विशाल पारिस्थितिक तंत्र को सहारा देता है। लेकिन आज यही हिमालय लगातार चेतावनी दे रहा है।

कभी केदारनाथ की विनाशकारी जल-त्रासदी, कभी धराली में आई भयावह बाढ़ और मलबे की तबाही, तो कभी नेपाल में बाढ़ और भूस्खलन—ये घटनाएँ केवल अलग-अलग प्राकृतिक आपदाएँ नहीं हैं। ये हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते पर्यावरणीय और जलवायु संकट की गंभीर कड़ियाँ हैं।

सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या हम इन चेतावनियों को समझ रहे हैं, या हर आपदा के बाद कुछ समय शोक मनाकर फिर उसी विकास मॉडल पर लौट जाते हैं?

केदारनाथ: एक त्रासदी या एक सबक?

वर्ष 2013 की केदारनाथ आपदा ने पूरे देश को झकझोर दिया था। हजारों लोगों की जान गई, सड़कें, पुल, भवन और पूरा जनजीवन तबाह हुआ। उस त्रासदी ने दुनिया को हिमालय की संवेदनशीलता का अहसास कराया।

लेकिन वर्षों बाद भी सवाल कायम है—क्या हमने वास्तव में उस आपदा से पर्याप्त सबक सीखा?

क्या संवेदनशील नदी घाटियों में निर्माण को लेकर हमारी नीतियाँ बदलीं? क्या अनियंत्रित पर्यटन और बढ़ते मानवीय दबाव पर गंभीरता से विचार हुआ? क्या पहाड़ की वहन क्षमता को विकास योजनाओं का आधार बनाया गया?

यदि इन सवालों के जवाब संतोषजनक नहीं हैं, तो हमें स्वीकार करना होगा कि हमने केदारनाथ की त्रासदी को याद तो रखा, लेकिन उसकी चेतावनी को पूरी तरह नहीं समझा।

धराली: नई चेतावनी, वही सवाल

धराली की त्रासदी ने एक बार फिर हिमालय की नाजुकता को सामने ला दिया है। अचानक आई बाढ़, मलबे और जलप्रवाह ने बस्तियों, सड़कों और जनजीवन को गंभीर रूप से प्रभावित किया। इस घटना ने यह सवाल फिर खड़ा किया कि क्या हम पर्वतीय क्षेत्रों में निर्माण और विकास की योजना बनाते समय स्थानीय भूगोल और प्राकृतिक जोखिमों को पर्याप्त महत्व दे रहे हैं?

पहाड़ में सड़क चाहिए। अस्पताल, शिक्षा, संचार और रोजगार भी चाहिए। विकास का विरोध समाधान नहीं है। लेकिन सवाल यह है कि विकास किस कीमत पर और किस वैज्ञानिक समझ के साथ हो रहा है?

जब पहाड़ को केवल काटने योग्य चट्टान, नदी को केवल संसाधन और नदी घाटी को केवल निर्माण की जगह समझा जाएगा, तब विकास अपने भीतर ही विनाश के बीज लेकर चलेगा।

धराली हमें यह सोचने के लिए मजबूर करता है कि नदी के प्राकृतिक रास्तों, जलधाराओं, ढलानों और संवेदनशील क्षेत्रों के साथ छेड़छाड़ की सीमा क्या होनी चाहिए।

नेपाल तक फैला संकट: सीमाएँ राजनीतिक हैं, हिमालय नहीं

नेपाल में लगातार सामने आती बाढ़ और भूस्खलन की घटनाएँ स्पष्ट करती हैं कि हिमालयी संकट किसी एक राज्य या देश तक सीमित नहीं है। नदियाँ राजनीतिक सीमाओं को नहीं मानतीं।

अत्यधिक वर्षा, भूस्खलन, ग्लेशियरों में परिवर्तन और बदलते मौसम के प्रभाव भारत और नेपाल दोनों के पर्वतीय क्षेत्रों को प्रभावित करते हैं।

इसलिए भारत और नेपाल को हिमालयी आपदा प्रबंधन, मौसम पूर्वानुमान, नदी तंत्र, जलवायु परिवर्तन और पारिस्थितिक संरक्षण के क्षेत्र में अधिक मजबूत क्षेत्रीय सहयोग की आवश्यकता है।

हिमालय की सीमाएँ नक्शे पर अलग हो सकती हैं, लेकिन उसकी पारिस्थितिकी एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई है।

क्या हर आपदा केवल प्राकृतिक है?

बारिश प्राकृतिक है। नदी का बहना प्राकृतिक है। भूस्खलन भी हिमालयी भूगोल की स्वाभाविक प्रक्रिया हो सकता है।

लेकिन जब प्राकृतिक घटनाएँ बड़े पैमाने पर मानवीय त्रासदी में बदल जाती हैं, तब हमें अपनी नीतियों और निर्णयों की समीक्षा करनी चाहिए।

हमें पूछना होगा—

  • क्या संवेदनशील क्षेत्रों में अनियोजित निर्माण बढ़ रहा है?
  • क्या सड़क निर्माण और पहाड़ कटान वैज्ञानिक मानकों के अनुरूप हो रहा है?
  • क्या नदियों और प्राकृतिक जलमार्गों के प्रवाह में हस्तक्षेप किया जा रहा है?
  • क्या धराली जैसे संवेदनशील क्षेत्रों की भूगर्भीय परिस्थितियों को विकास योजनाओं में पर्याप्त महत्व दिया गया?
  • क्या स्थानीय समुदायों और पारंपरिक ज्ञान को निर्णय प्रक्रिया में शामिल किया जा रहा है?
  • क्या हमारी चेतावनी और निकासी व्यवस्था वास्तविक आपदा की गति के अनुरूप है?

इन सवालों से बचकर हिमालय को सुरक्षित नहीं रखा जा सकता।

विकास चाहिए, लेकिन विनाश की कीमत पर नहीं

हिमालयी क्षेत्रों को विकास की आवश्यकता है। गांवों को सड़क चाहिए, युवाओं को रोजगार चाहिए, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएँ चाहिए और शिक्षा के अवसर चाहिए।

लेकिन मैदानी क्षेत्रों के विकास मॉडल को उसी रूप में पहाड़ों पर लागू नहीं किया जा सकता।

हिमालय के लिए विकास का अर्थ होना चाहिए—

वैज्ञानिक योजना + स्थानीय भागीदारी + पर्यावरणीय संतुलन + सुरक्षित निर्माण + दीर्घकालिक सोच।

बड़े निर्माण से पहले भूगर्भीय अध्ययन, ढलानों की स्थिरता, नदी तंत्र और क्षेत्र की वहन क्षमता को गंभीरता से समझना होगा।

जलवायु परिवर्तन की नई वास्तविकता

हिमालय में बदलते मौसम के बीच अत्यधिक वर्षा की घटनाएँ, अनियमित मानसून, ग्लेशियरों में बदलाव और तेजी से बदलते जलवायु पैटर्न नई चुनौतियाँ पैदा कर रहे हैं।

इसलिए पुराने अनुभवों के आधार पर भविष्य की योजना बनाना पर्याप्त नहीं होगा।

हमें प्राथमिकता देनी होगी—

  • बेहतर मौसम और वर्षा पूर्वानुमान
  • स्थानीय स्तर पर प्रभावी चेतावनी तंत्र
  • सुरक्षित निकासी मार्ग
  • आपदा-संवेदनशील निर्माण मानक
  • नदी घाटी आधारित योजना
  • समुदाय आधारित आपदा प्रबंधन

जवाबदेही की शुरुआत सवालों से होगी

हिमालय को बचाने की चर्चा केवल भावनात्मक नारों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। वास्तविक संरक्षण के लिए सरकारों, योजनाकारों, निर्माण एजेंसियों, विशेषज्ञ संस्थाओं और समाज—सभी से कठिन सवाल पूछने होंगे।

क्या हम पर्यटन के नाम पर हिमालय पर असहनीय दबाव नहीं डाल रहे?

क्या हमारी निर्माण परियोजनाएँ भविष्य की आपदाओं को ध्यान में रखकर बनाई जा रही हैं?

क्या आपदा के बाद पुनर्निर्माण का अर्थ केवल पहले जैसा निर्माण कर देना है, या उससे अधिक सुरक्षित और वैज्ञानिक तरीके से पुनर्विचार करना भी है?

और सबसे महत्वपूर्ण—

क्या हम हिमालय को केवल संसाधन समझते हैं, या एक जीवंत और संवेदनशील पारिस्थितिक व्यवस्था?

अब भी समय है

केदारनाथ से धराली और नेपाल तक की जल-त्रासदियाँ एक साझा संदेश देती हैं—हिमालय को समझे बिना हिमालय में विकास नहीं किया जा सकता।

हर टूटी सड़क को फिर से बना देना समाधान नहीं है। हर बह गए घर की जगह नया घर खड़ा कर देना भी पर्याप्त नहीं है।

असली समाधान उस व्यवस्था को बदलने में है, जो हर त्रासदी के बाद पुनर्निर्माण तो करती है, लेकिन अगली त्रासदी को रोकने के लिए पर्याप्त बदलाव नहीं करती।

हिमालय को राहत पैकेज से अधिक दूरदर्शी नीति चाहिए।
उसे घोषणाओं से अधिक वैज्ञानिक योजना चाहिए।
उसे दोहन से अधिक संरक्षण चाहिए।
और उसे दर्शक नहीं, बल्कि जिम्मेदार नागरिक और जवाबदेह व्यवस्था चाहिए।

हिमालय चेतावनी दे रहा है। सवाल यह नहीं कि चेतावनी कितनी स्पष्ट है—सवाल यह है कि हम कब सुनेंगे।

निष्कर्ष

केदारनाथ की स्मृति, धराली की त्रासदी और नेपाल तक फैली जल-त्रासदियाँ हमें यह समझने के लिए पर्याप्त हैं कि हिमालयी संकट अब भविष्य की आशंका नहीं, बल्कि वर्तमान की वास्तविकता है।

अब निर्णय हमें करना है—क्या हम हर अगली आपदा के बाद फिर कहेंगे कि यह अप्रत्याशित था, या समय रहते स्वीकार करेंगे कि प्रकृति की चेतावनियों को अनदेखा करने की एक कीमत होती है?

हिमालय रोएगा तो केवल पहाड़ नहीं टूटेंगे—नदियाँ, गांव, शहर और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी प्रभावित होगा।

इसलिए विकास और पर्यावरण के बीच चयन का नहीं, बल्कि संतुलन स्थापित करने का समय है।


यूथउत्तराखंड (Youth Uttarakhand) | रोहित रावत

हिमालय की आवाज़ • पर्यावरण की चेतावनी • जवाबदेही की माँग

हल्द्वानी/रामनगर। उत्तराखंड की पारंपरिक कला, स्वरोजगार और महिला सशक्तिकरण को नई पहचान देने के उद्देश्य से आयोजित मिनी सरस मेले में ‘देवी माँ स्वयं सहायता समूह (हल्द्वानी)’ ने उत्कृष्ट स्टॉल श्रेणी में प्रथम स्थान हासिल कर क्षेत्र का नाम रोशन किया है। यह आयोजन मुख्य विकास अधिकारी (CDO) श्री अरविंद पांडेय और एपीडी श्रीमती चंद्रा फर्तियाल के कुशल मार्गदर्शन एवं निगरानी में सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।

50 से अधिक स्टॉलों में छाया रेशम और एपण का जादू
मेले में राज्य के विभिन्न जिलों से आए स्वयं सहायता समूहों द्वारा 50 से अधिक स्टॉल लगाए गए थे। इनमें समूह की कविता ऐरी द्वारा लगाए गए स्टॉल ने अपने विशेष आकर्षण, उत्पादों की गुणवत्ता और उत्कृष्ट सजावट के कारण बाजी मारी। स्टॉल पर रेशम से तैयार विशेष उत्पाद और उत्तराखंड की पारंपरिक पण (Aipan) कला से बनी सामग्रियां लोगों व निर्णायक मंडल के आकर्षण का मुख्य केंद्र रहीं।

अधिकारियों और टीम को दिया श्रेय
मंच पर प्रथम पुरस्कार से सम्मानित होने के बाद कविता ऐरी ने इस सफलता का श्रेय अपने समूह की सहयोगी अन्नू राना सहित पूरी टीम की कड़ी मेहनत और सामूहिक प्रयास को दिया। उन्होंने विशेष सहयोग और मार्गदर्शन के लिए:मुख्य विकास अधिकारी (CDO): श्री अरविंद पांडेय एपीडी: श्रीमती चंद्रा फर्तियालडीटी: श्री रविंद्र बजेटा ब्लॉक टीम व अधिकारी: तनवीर असगर, BMM जानकी, विक्रम सिंह (टीम समन्वयक) एवं विभागीय अधिकारियों का हार्दिक आभार व्यक्त किया।

महिला सशक्तिकरण और ‘वोकल फॉर लोकल’ का संदेश
यह उपलब्धि न केवल ‘देवी माँ स्वयं सहायता समूह’ के लिए गर्व का क्षण है, बल्कि ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने और उत्तराखंड की लुप्त होती पारंपरिक कलाओं को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने की दिशा में एक प्रेरणादायक कदम साबित होगी।

कुमाऊँ समाज सेवा समिति पिछले 12–13 वर्षों से जनकल्याण और सामाजिक सेवा के कार्यों में निरंतर सक्रिय भूमिका निभा रही है। समिति का उद्देश्य केवल सामाजिक आयोजनों तक सीमित न रहकर जरूरतमंद परिवारों के सुख-दुःख में साथ खड़ा होना और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाना है।

जरूरतमंद परिवार को ₹65 हजार की आर्थिक सहायता

इसी सेवा भावना के तहत बीमारी से जूझने के बाद दिवंगत हुए वैशाली निवासी समिति के एक सदस्य के परिवार की आर्थिक स्थिति को देखते हुए समिति आगे आई। लंबे समय तक इलाज में परिवार की जमा पूंजी खर्च हो जाने के कारण आर्थिक परिस्थितियां बेहद कठिन हो गई थीं।

ऐसे समय में कुमाऊँ समाज सेवा समिति ने परिवार को ₹65,000 की आर्थिक सहायता प्रदान की। समिति के पदाधिकारियों एवं सदस्यों ने परिजनों को चेक सौंपकर संकट की घड़ी में उनके साथ खड़े रहने का संदेश दिया।

मंदिर और पार्क के विकास में भी योगदान

समिति की सामाजिक जिम्मेदारी केवल व्यक्तिगत सहायता तक सीमित नहीं है। सदस्यों द्वारा वैशाली मंदिर में लगभग ₹50,000 मूल्य की सामग्री का दान किया गया।

इसके साथ ही राम वाटिका पार्क, वैशाली के विकास एवं सौंदर्यीकरण के लिए ₹40,000 से अधिक की राशि राम वाटिका विकास समिति को सहयोग स्वरूप प्रदान की गई। यह पहल सार्वजनिक स्थलों के विकास के प्रति समिति की प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

जरूरतमंद मरीजों के लिए 6 यूनिट रक्तदान

स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में भी समिति के सदस्यों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। हृदय रोगियों के उपचार में सहायता के उद्देश्य से यशोदा हॉस्पिटल, कौशांबी में 6 यूनिट रक्तदान किया गया।

रक्तदान जैसे कार्य समाज में सहयोग और मानवता की भावना को मजबूत करते हैं। समिति का यह प्रयास इस बात का उदाहरण है कि छोटी-सी पहल भी किसी जरूरतमंद के लिए जीवनदायी सहयोग बन सकती है।

सेवा कार्यों को जारी रखने का संकल्प

समिति के अध्यक्ष हरीश साह ने सभी पदाधिकारियों और सदस्यों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि समिति के सदस्य एक संदेश पर जरूरतमंदों की सहायता के लिए आगे आते हैं। यही एकजुटता और सेवा भावना संस्था की सबसे बड़ी ताकत है।

उन्होंने कहा कि भविष्य में भी समिति जरूरतमंद परिवारों, सामाजिक संस्थाओं और जनकल्याण के कार्यों में तन-मन-धन से सहयोग करती रहेगी।

सहायता प्राप्त परिवार ने समिति के सभी सदस्यों के प्रति आभार व्यक्त किया। वहीं राम वाटिका विकास समिति ने भी सहयोग के लिए कुमाऊँ समाज सेवा समिति का धन्यवाद किया।

उत्सव से आगे, समाजसेवा की जिम्मेदारी

कुमाऊँ समाज सेवा समिति का यह प्रयास बताता है कि सामाजिक संगठन केवल उत्सव और सांस्कृतिक कार्यक्रमों तक सीमित नहीं होते, बल्कि समाज के कठिन समय में सहारा, सहयोग और संवेदना का माध्यम भी बन सकते हैं।

लगातार वर्षों से जरूरतमंद परिवारों की सहायता, मंदिर एवं सार्वजनिक स्थलों के विकास और रक्तदान जैसे कार्यों के माध्यम से समिति ने “सेवा ही समाज की शक्ति है” की भावना को सार्थक किया है।

यह सच्ची गाथा है एक वीर सैनिक की। भारत मां के इस सच्चे सपूत की जिंदगी तो देश की रक्षा के लिए समर्पित थी ही, यह सैनिक शहीद होने के बाद भी आज तक सीमा की सुरक्षा में लगा है। यह जांबाज सैनिक था जसवंत सिंह रावत। इसकी बहादुरी के चलते सेना ने जसवंत के शहीद होने के 40 साल बाद रिटायरमेंट देने की घोषणा की। इस बीच जसवंत को पदोन्नति भी दी जाती रही। देश के इतिहास में यह एक मात्र उदाहरण है जसंवत सिहं ने चीन युद्ध के समय ऐसी वीरता का परिचय दिया था जो अविश्वसनीय है।

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राइफलमैन जसवंत सिंह रावत हीरों ऑफ़ नेफा चीन युद्ध की कहानी

जसवंत  सिंह रावत 4 गढ़वाल राइफल्स, उत्तराखंड के एक भारतीय राइफलमेन सिपाही थे जिन्होंने 1962 में भारत-चीन युद्ध के दौरान अरुणाचल प्रदेश में नूरानंग की लड़ाई में मरणोपरांत महा वीर चक्र जीता था। उनका जन्म 1 9 अगस्त, 1 9 41 को श्री गुमान सिंह रावत के घर में गांव बैरुन, पौड़ी गढ़वाल में हुआ था। 1962 चीन युद्ध के समय जसवंत सिहं अपने कुमाऊँ रेजिमेण्ट के साथ लद्दाख मे मोर्चा संभाले थे। उस समय जबरदस्त भीषण युद्ध मे उनके सभी साथी एक-एक करने शहीद होते चले गये।
अन्त मे केवल जसवंत सिहं जिन्दा बचे थे, उन्होने वहा की दो स्थानिय युवतियो की सहायता से अकेले मोर्चा संभाला और 72 घण्टे तक युद्ध किया और 300 चीनी सैनिको मार गिराया। उसके बाद दुश्मनो की गोलियो का शिकार बन गये और वीरगति प्राप्त की। 1962 के युद्ध मे 676 चीनी सैनिक मारे गये थे जिनमे से 300 अकेले वीर जसवंत सिहं ने मार गिराये। जसवंत सिहं की वीरता से प्रभावित होकर चीनी सरकार ने उनकी एक ताम्बे से बनी मुर्ति भारत सरकार को भेट की। जसवंत सिहं की याद मे एक मंदिर बनाया गया तथा इस मुर्ति को वही प्रतिष्ठित कर दिया गया।   राइफलमैन जसवंत सिंह रावत को 21 वर्ष की आयु में मरणोपरांत महावीर_ क्र से सम्मानित किया गया।

17 नवंबर 1962- राइफलमैन जसवंत सिंह रावत,4 गढ़वाल राइफल्स 

1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण कर दिया थाl अरुणाचल प्रदेश के ऊँचे पहाड़ों पर घमासान युद्ध चल रहा था l भारतीय सिपाही जी जान लगा कर लड़ रहे थी, पर चीन हर दृष्टि से भारत पर हावी था l उनके पास सैनिक संख्या बहुत बड़ी थी, बहुत बड़ी मात्रा में हथियार और वो भी आधुनिक हथियार थे, जिनकी मारक क्षमता अधिक थी l हालाँकि भारत के पास सैन्य बल और हथियार दोनों की ही कमी थी, पर एक बात की कमी नहीं थी और वो था मनोबल l चीन की सेना से लोहा लेने के लिए ४ गढ़वाल राइफल्स को अरुणाचल प्रदेश भेजा गया , इसी ४ गढ़वाल राइफल्स में थे राइफल मैन जसवंत सिंह रावत.

19 अगस्त 1941 को  पौड़ी गढ़वाल में जन्म जसवंत सिंह 19 वर्ष की आयु में सेना में भर्ती हुए, चीन से युद्ध के महज डेढ़ साल पहले , पर युद्ध के मैदान में उनकी सूझ बूझ दुश्मनों पर भरी पड़ी . जसवंत सिंह रावत ने जिस युद्ध में चीन के सैनिकों से लोहा लिया उसे  नूरानांग_युद्ध के नाम से जाना जाता है l नवम्बर के महीने में भारतीय सेना  तवांग से पीछे हट गयी और वहाँ ४ गढ़वाल राइफल्स को सेला इलाके की सुरक्षा के लिए तैनात किया गया, जिस से सेना की नयी टुकड़ी आकर आगे बढ़ सके .

गढ़वाल राइफल्स के वीर सैनिकों ने तीन बार चीन की सुसज्जित सेना को खदेड़ दिया था, अब चौथी बार दुश्मन आगे बढ़ रहा था l भारतीय सेना के पास सैनिकों की संख्या बहुत कम थी , साथ ही गोला बारूद भी ख़त्म हो रहा था l आधुनिक हथियारों से लैस चीनी सैनिकों से लड़ना मुश्किल हो रहा था, इसलिए सैनिकों को वापस आने का आदेश दे दिया गया था, 17 नवम्बर को चीनी सेना ने फिर नूरानांग पर हमला बोला l M M G यानि मीडियम मशीन गन से लगातार गोलियों की बौछार हो रही थी, जो बहुत घातक थी l परन्तु २१ वर्षीय इस सिपाही ने पीछे हटने से माना कर दिया l अद्भुत साहस और शूरता के परिचय देते हुए,  राइफलमैन जसवंत सिंह रावत, लांस नायक त्रिलोक सिंह नेगी और राइफलमैन गोपाल सिंह गुसाईं, इन तीनों ने मिलकर तय किया कि आग उगलती इस मशीन गन को शांत करना है l सादे कैनवास के जूते और एक हैंड ग्रनेड से लैस,लगभग चौदह हज़ार फ़ीट ऊँची इस युद्ध भूमि में जसवंत सिंह रावत अपने साथियों के साथ बर्फ में रेंगते हुए दुश्मन के बंकर की ओर गए l मशीन गन से करीब 12 मीटर की दूरी से जसवंत सिंह ने एक ग्रेनेड बंकर में फेंका, जिस से कई चीनी सैनिकों की मौत हो गयी l उन्होंने वो मशीन गन उठा ली और रेंगते हुए वापस जाने लगे, अपनी खंदक के पास पहुँच ही गए थे, पर तभी उनके सर पर गोली लगी और वे शहीद हो गए, त्रिलोक_सिंह_नेगी भी शहीद हो गए, बुरी तरह से ज़ख़्मी गोपाल सिंह गुसाईं, किसी तरह से दुश्मन की मशीन गन अपने खंदक तक ले गए l 15 मिनट के इस अदम्य साहस के नतीजा ये हुआ की भारतीय सेना की नयी टुकड़ी को वहाँ तक पहुँचने के समय मिल गया और हमरो सेना की मशीन गन फिर चलने लगीं l इस घटना के युद्ध में दूरगामी परिणाम हुए l चीनी सेना को भरी नुकसान हुआ, करीब 300 चीनी सैनिक मरे गए, अरुणाचल प्रदेश चीन के कब्ज़े में जाने से बच गया और शीघ्र ही युद्ध विराम घोषित कर दिया गया .जसवंत सिंह ने तीन दिनों तक दुश्मनों के मुकाबला किया ।

जसवंत सिंह रावत जिनकी शूर वीरता के किस्से न केवल सेना के आधिकारिक रिकार्ड्स में बल्कि लोक कथा के रूप में भी आज तक प्रसिद्द हैं l उनका साहस और पराक्रम इतना प्रभावी था की उनका मंदिर और संग्रहालय आज भी अरुणाचल प्रदेश में है .

 मरणोपरांत महावीर चक्र

जसवंत_सिंह_रावत को इस साहस, पराक्रम और बलिदान के लिए,  मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया , साथ ही वीर #त्रिलोक_सिंह_नेगी को  मरणोपरांत वीर चक्र और   गोपाल सिंह गुसाईं को  वीर चक्र से सम्मानित किया गया l जसवंत सिंह रावत की 4 गढ़वाल राइफल्स को ”बैटल ऑनर  नूरानांग’‘ से सम्मानित किया गया, 1962के युद्ध में एक मात्र सेना की यूनिट को ये सम्मान मिला .

राइफल मन जसवंत सिंह रावत को 1962 के इस युद्ध के नायक माना जाता है और जहाँ वे शहीद हुए उस स्थान को जसवंतगढ़ के नाम से जाना जाता है ।

बाबा जसवंत सिंह

जसवंत सिंह रावत को लोग  बाबा जसवंत सिंह कहते हैं, आज भी सेना के जवान जब भी वहाँ से गुज़रते हैं, वे बाबा जसवंत सिंह से मिलने ज़रूर जाते हैं l वहाँ के निवासियों के लिए जसवंत सिंह भगवान के सामान है, जिसने अरुणाचल प्रदेश को चीन से बचा लिया ।जसवंत रावत को स्थानीय लोगों द्वारा एक पवित्र बाबा के रूप में माना जाता है, जो उस इलाके पर निगरानी रखते है और उस क्षेत्र की सुरक्षा करते है। उस जगह पर एक स्मारक भी बनाया गया है जहां उन्होंने लड़ाई लड़ी और अब उस जगह को जसवंतगढ़ के नाम से जाना जाता है। इस मार्ग से जो कोई भी गुजरता है, जनरल से लेकर जवान सभी यहां उन्हें सम्मान देते हैं और माथा टेकते हैं।

ऐसा माना जाता है जैसे वे अभी भी जीवित है, रोजाना उनके बूट पोलिश किये जाते हैं, कपडे धुले और स्त्री किये जाते हैं और बिस्तर बनाया जाता है|। अक्सर उन्हें जुटे कीचड़ में सने पाए जाते हैं, मानो वे रात भर चले हों। सुबह उनका बिस्तर देख भी ऐसा लगता है जैसे कोई सोया हो| यह भी जाता है कि बर्फीले तूफ़ान में फसे गाड़ियों के काफिले ने जसवंत को तीखे मोड़ों पर वाहनों को निर्देशित करते देखा है। उनकी मृत्यु के बाद भी वे समय पर पदोन्नति प्राप्त करते हैं। जसवंत सिंह के ये बलिदान, देशप्रेम और निडरता आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेरणा देती रहेगी .

भारत माता के वीर सपुत शहीद जसवंत सिहं को कोटि-कोटि नमन्।