उत्तराखंड की वीरभूमि ने देश को अनगिनत जांबाज सैनिक दिए हैं। उन्हीं वीर सपूतों में से एक थे हवलदार चंद्रमोहन सिंह रावत, जिन्होंने मातृभूमि की रक्षा करते हुए अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान दिया। उनका साहस, कर्तव्यनिष्ठा और देशभक्ति आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणा का स्रोत रहेंगे।

प्रारंभिक जीवन

हवलदार चंद्रमोहन सिंह रावत का जन्म उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जनपद के नैनीडांडा ब्लॉक के डांडातोली क्षेत्र स्थित कुकलियाल गांव में हुआ था। पहाड़ की सादगी, संस्कार और देशसेवा की भावना उनके व्यक्तित्व में बचपन से ही दिखाई देती थी। बाद में उनका परिवार नंदग्राम, गाजियाबाद (उत्तर प्रदेश) में रहने लगा, जहां उनका वर्तमान निवास था।

शहादत की घटना

6 जुलाई को मणिपुर के उखरुल जिले में असम राइफल्स का एक सैन्य काफिला नियमित अभियान से लौट रहा था। इसी दौरान घात लगाए बैठे उग्रवादियों ने अचानक काफिले पर गोलीबारी और विस्फोटक हमला कर दिया।

इस भीषण हमले में हवलदार चंद्रमोहन सिंह रावत ने अदम्य साहस और वीरता का परिचय देते हुए अपने साथियों और देश की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया। उनकी शहादत ने पूरे देश को गर्व और शोक दोनों से भर दिया।

परिवार पर टूटा दुखों का पहाड़

हवलदार चंद्रमोहन सिंह रावत के परिवार पर यह दुख असहनीय था। शहादत से लगभग 35 दिन पहले उनके पिता का निधन हो गया था। पिता के अंतिम संस्कार और परिवार की जिम्मेदारियां निभाने के बाद वे पुनः अपनी ड्यूटी पर लौटे। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।

ड्यूटी पर लौटने के अगले ही दिन, 6 जुलाई को मणिपुर में हुए उग्रवादी हमले में वे वीरगति को प्राप्त हो गए। महज 35 दिनों के भीतर परिवार ने पहले पिता और फिर अपने सबसे मजबूत सहारे को खो दिया।

वे अपने पीछे पत्नी श्रीमती मंजू देवी रावत, पुत्र राहुल सिंह रावत, तथा पुत्रियां रितिका रावत और यशिका रावत को छोड़ गए हैं।

अंतिम विदाई

जब उनका पार्थिव शरीर तिरंगे में लिपटकर गाजियाबाद स्थित उनके आवास पहुंचा, तो अंतिम दर्शन के लिए हजारों लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। पूरे क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई और लोगों ने नम आंखों से अपने वीर सपूत को श्रद्धांजलि अर्पित की।

इसके बाद हिंडन घाट पर पूरे सैन्य और राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया। सेना के जवानों ने उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर देकर अंतिम सलामी दी और राष्ट्र ने अपने एक वीर सपूत को अश्रुपूर्ण विदाई दी।

हवलदार चंद्रमोहन सिंह रावत का बलिदान सदैव अमर रहेगा। उनका जीवन हमें सिखाता है कि मातृभूमि की रक्षा से बड़ा कोई धर्म नहीं होता। पूरा उत्तराखंड और पूरा देश इस वीर सपूत को शत-शत नमन करता है।

विनम्र श्रद्धांजलि।
जय हिंद। 🇮🇳

उत्तराखंड के पहाड़ों से पलायन आज एक बड़ी चुनौती बन चुका है, लेकिन इसी देवभूमि के कुछ जाबांज युवा ऐसे भी हैं जो “एक कदम पहाड़ की ओर” बढ़ाते हुए न सिर्फ वापस अपनी जड़ों की तरफ लौट रहे हैं, बल्कि स्थानीय संसाधनों को रोजगार का जरिया बनाकर दूसरों के लिए भी मिसाल पेश कर रहे हैं।

ऐसी ही एक बेहद प्रेरणादायक कहानी है अल्मोड़ा के पेटशाल गाँव के रहने वाले दीपक पेटशाली की, जिन्होंने पहाड़ों की अनमोल जड़ी-बूटियों और पारंपरिक स्वाद को समेटकर ‘BNK Herbal Tea’ नाम से एक शुद्ध, हैंडमेड और इको-फ्रेंडली ब्रांड की नींव रखी है।

गाँव की पगडंडियों से सिडकुल और फिर वापस ‘पहाड़ की ओर’

दीपक पेटशाली की शुरुआती पढ़ाई गाँव के ही सरकारी स्कूल से हुई और इंटरमीडिएट की परीक्षा उन्होंने GIC अल्मोड़ा से उत्तीर्ण की। उत्तराखंड के आम युवाओं की तरह वे भी रोजगार की तलाश में मैदान की तरफ गए और सिडकुल (Sidcul) रुद्रपुर में FMCG सेक्टर के साथ-साथ कई अन्य कंपनियों में काम किया।

लेकिन दिल हमेशा पहाड़ के लिए ही धड़कता था। अपनी माटी के कर्ज को चुकाने और कुछ अलग करने की चाहत उन्हें वापस अल्मोड़ा खींच लाई। यहाँ आकर उन्होंने एक सामाजिक संस्था (NGO) में लगातार 8 वर्षों तक काम किया। इसी सामाजिक जुड़ाव ने उन्हें पहाड़ों की असली ताकत और स्थानीय समस्याओं को करीब से समझने का मौका दिया।

एक प्याली चाय से मिला जीवन का सबसे बड़ा बिज़नेस आइडिया

हते हैं कि अगर नीयत साफ हो, तो रास्ते अपने आप बन जाते हैं। NGO में काम करने के दौरान दीपक अक्सर अपने साथियों को पहाड़ों की प्राकृतिक जड़ी-बूटियों से बनी अलग-अलग तरह की चाय बनाकर पिलाया करते थे। उनके हाथ की चाय की खुशबू और औषधीय गुणों का हर कोई कायल था। सहकर्मियों और दोस्तों ने बार-बार एक ही बात कही— “दीपक, इस काम में जादू है। तुम्हें इसे बड़े स्तर पर शुरू करना चाहिए।”

यहीं से दीपक को एक ऐसा व्यवसाय शुरू करने का विचार आया जो पूरी तरह से प्रकृति से जुड़ा हो और समाज को स्वस्थ बनाए। इस तरह 08 अक्टूबर 2023 को जन्म हुआ ‘BNK HERBAL TEA’ ब्रांड का।

“मेरा काम ही मेरी पहचान है, और प्रकृति से मेरा अनन्य प्रेम ही इस बिज़नेस की असली ताकत है।” — दीपक पेटशाली

100% हैंडमेड: मशीनों से दूर, शुद्धता के पास

बाजार में मिलने वाली चाय पत्तियों और केमिकल्स से दूर, BNK Herbal Tea की सबसे बड़ी खूबी इसका 100% हैंडमेड होना है। पहाड़ों की पारंपरिक पद्धतियों को जिंदा रखते हुए, बिना किसी मशीन के प्रयोग के इन हर्बल चाय को तैयार किया जाता है।

शुरुआत सिर्फ उत्तराखंड के प्रसिद्ध जंगली फल काफल से बनी ‘काफल हर्बल टी’ से हुई थी, लेकिन आज दीपक के पास 7 लाजवाब प्रोडक्ट्स की श्रृंखला उपलब्ध है:

हविशेष उत्पाद (50 ग्राम ग्लास जार और 40 ग्राम पाउच में उपलब्ध):

  • 5 प्रकार की प्रीमियम हर्बल चाय:
    1. Kafal Herbal Tea (काफल हर्बल टी)
    2. Mint Herbal Tea (पुदीना हर्बल टी)
    3. Buransh Herbal Tea (बुरांश हर्बल टी – राज्य पुष्प की खूबियों से भरपूर)
    4. Tulsi-Ginger Tea (तुलसी-अदरक हर्बल चाय)
    5. Nettle Herbal Tea (कंडाली/बिच्छू घास की चाय – स्वास्थ्य के लिए अमृत)
    6. Thyme Herbal Tea (जंगली अजवाइन/थाइम चाय)
    7. Himalayan Tulsi Lemongrass Tea (तुलसी लेमनग्रास चाय)
  • 2 प्रकार के विशेष चाय मसाले:
    • Chai Masala (Milk): दूध वाली चाय के शौकीनों के लिए औषधीय तड़का।
    • Chai Masala Black & Herbal Tea: ब्लैक टी और काढ़े के लिए सबसे बेहतरीन मसाला।

देश के कोने-कोने तक पहाड़ों की खुशबू

आज BNK Herbal Tea न केवल उत्तराखंड, बल्कि पूरे देश में अपनी पहचान बना रही है। दीपक ने अपने उत्पादों को डिजिटल और ऑफलाइन दोनों ही तरीकों से बाजार में उतारा है:

  • ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स: अमेज़न (Amazon), मीशो (Meesho), और उत्तराखंड की पारंपरिक धरोहर को बढ़ावा देने वाले मंच ‘उत्तराखंड हाट’ (Uttarakhand Haat) पर ये उत्पाद आसानी से ऑर्डर किए जा सकते हैं।
  • ऑफलाइन नेटवर्क: स्थानीय आउटलेट्स, पहाड़ों के खूबसूरत कैफ़े, होटल्स, मिनी मार्ट और खासकर ‘होम स्टे’ के माध्यम से पर्यटकों तक देवभूमि का यह असली स्वाद पहुँचाया जा रहा है

स्वरोजगार से स्वावलंबन की मिसाल

दीपक पेटशाली की यह यात्रा केवल एक सफल व्यवसाय की कहानी नहीं, बल्कि स्थानीय संसाधनों से आत्मनिर्भर उत्तराखंड बनाने की प्रेरणा है। उन्होंने यह साबित किया है कि यदि युवा अपने गाँव लौटकर स्थानीय उत्पादों को पहचान दें, तो पलायन जैसी चुनौती का समाधान भी संभव है।

“हमें नौकरी ढूंढने वाला नहीं, बल्कि नौकरी देने वाला बनना होगा। जब हम अपनी माटी के संसाधनों का सम्मान करेंगे और स्वयं उद्यम शुरू करेंगे, तभी हमारे पहाड़ आबाद रहेंगे। प्रकृति और समाज—दोनों को आत्मनिर्भर बनाना हमारी जिम्मेदारी है।”

यही है — “एक कदम पहाड़ की ओर”।

“यदि पहाड़ का हुनर आगे बढ़ेगा, तो पहाड़ का भविष्य भी मजबूत होगा।” यह केवल एक विचार नहीं, बल्कि उस मुहिम का संकल्प है जो उत्तराखंड के सीमांत क्षेत्र मुनस्यारी से उठकर आज पूरे देश में अपनी गूंज सुना रही है। इस मुहिम के सारथी हैं—वीरेंद्र सिंह मपवाल। उत्तराखंड की हसीन वादियों में सिर्फ खूबसूरती ही नहीं, बल्कि संस्कृति और हुनर का एक अनमोल खजाना भी छुपा है। इसी समृद्ध संस्कृति, पारंपरिक अंगोरा शॉल, पशमीना और जोहार घाटी की पौराणिक हस्तशिल्प को सहेजने के साथ-साथ अपने शौका समुदाय के स्थानीय उत्पादों को देश के कोने-कोने तक पहुँचाने का सराहनीय कार्य वीरेंद्र सिंह मपवाल कर रहे हैं।

‘Himalayan Munsyari Store’: सिर्फ व्यापार नहीं, परंपरा का मंच

वीरेंद्र सिंह मपवाल द्वारा स्थापित “Himalayan Munsyari Store” केवल एक व्यावसायिक प्रतिष्ठान या दुकान नहीं है। यह असल में पहाड़ की जीवंत कला, सदियों पुरानी परंपरा और स्थानीय कारीगरों के सपनों को उड़ान देने का एक बेहद खूबसूरत और ईमानदार प्रयास है।

इस स्टोर में कदम रखते ही आपको उत्तराखंड की मिट्टी की खुशबू का अहसास होगा। स्टोर की खासियतें कुछ इस प्रकार हैं:

पारंपरिक शिल्प का अनूठा संग्रह: यहाँ उच्च गुणवत्ता वाले ऊनी वस्त्र, विश्वप्रसिद्ध पश्मीना, बेहद सुकोमल अंगोरा उत्पाद और जोहार घाटी की पौराणिक हस्तशिल्प कला का बेहतरीन कलेक्शन उपलब्ध है।

कुमाऊँनी शैली की जीवंत झलक: स्टोर की आकर्षक सजावट और इसकी पारंपरिक कुमाऊँनी शैली हर आने वाले ग्राहक को सम्मोहित कर लेती है। यह स्टोर व्यापारिक केंद्र से ज्यादा उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर का एक छोटा संग्रहालय प्रतीत होता है।

हर उत्पाद के पीछे एक कहानी: यहाँ मिलने वाला प्रत्येक उत्पाद महज एक वस्तु नहीं है, बल्कि उसके पीछे उत्तराखंड के बुनकरों की कड़ी मेहनत, उनकी पीढ़ियों पुरानी परंपरा और पहाड़ों की आत्मीयता की एक अनकही कहानी छुपी है।

‘वोकल फॉर लोकल’ और आत्मनिर्भरता को नई दिशा

वीरेंद्र सिंह मपवाल का मुख्य उद्देश्य सिर्फ मुनाफा कमाना या व्यापार का विस्तार करना नहीं है। उनका असली मकसद सामाजिक और आर्थिक रूप से स्थानीय समाज को मजबूत करना है।

मुख्य स्तंभप्रभाव और उद्देश्य
कारीगरों को उचित मंचस्थानीय कारीगरों और छोटे उद्यमियों को एक ऐसा बाजार देना जहाँ बिचौलियों के बिना उन्हें सही दाम मिल सके।
महिला सशक्तिकरणपहाड़ की महिलाओं के हुनर (जैसे बुनाई और हस्तशिल्प) को आर्थिक स्वतंत्रता में बदलना।
सांस्कृतिक संरक्षणजोहार घाटी और शौका समुदाय की विलुप्त होती पारंपरिक कलाओं को नई पीढ़ी के बीच जीवित रखना।

उनका यह विजन प्रधानमंत्री के “वोकल फॉर लोकल” के नारे को जमीनी स्तर पर सच साबित करता है और ‘आत्मनिर्भर उत्तराखंड’ की भावना को एक नई और मजबूत रीढ़ प्रदान करता है।

एक प्रेरणादायक पहल

पलायन के दंश को झेलते पहाड़ों के बीच वीरेंद्र सिंह मपवाल जैसे लोग उम्मीद की एक नई किरण बनकर उभरे हैं। उन्होंने यह साबित कर दिया है कि यदि सही नीयत और अपनी जड़ों के प्रति सम्मान हो, तो स्थानीय स्तर पर रहकर भी वैश्विक स्तर की पहचान बनाई जा सकती है।

वीरेंद्र सिंह मपवाल का यह प्रयास वास्तव में उत्तराखंड की संस्कृति, हस्तशिल्प और स्थानीय उत्पादों को एक नई और गौरवमयी पहचान देने की दिशा में एक अत्यंत प्रेरणादायक और अनुकरणीय पहल है। पहाड़ के इस हुनर को सलाम!

हल्द्वानी (नैनीताल)। पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी भले ही कभी यहाँ के काम न आने की कहावत रही हो, लेकिन आज उत्तराखंड की बेटियां इस सोच को बदल रही हैं। देवभूमि की समृद्ध संस्कृति, पारंपरिक लोक कला और ग्रामीण आजीविका को एक नया आयाम दे रही हैं—कविता बिष्ट ऐरी। हल्द्वानी की रहने वाली कविता जी आज किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। वे एक कुशल सामाजिक कार्यकर्ता, महिला सशक्तिकरण की मुखर आवाज़ और सैकड़ों ग्रामीण महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।

कला और संस्कृति को बनाया आजीविका का हथियार

कविता बिष्ट ऐरी जी ने उत्तराखंड की पारंपरिक धरोहर को सिर्फ सहेजने का काम नहीं किया, बल्कि उसे रोज़गार का एक ठोस जरिया बना दिया है। वे मुख्य रूप से तीन क्षेत्रों में अभूतपूर्व कार्य कर रही हैं:

  • रेशम (Silk) पेंटिंग और ऐपण (Aipan): उत्तराखंड की लोक कला ‘ऐपण’ और बारीक ‘रेशम पेंटिंग’ के जरिए वे स्थानीय कला को आधुनिक बाज़ार के अनुरूप ढाल रही हैं। उनके द्वारा तैयार और प्रशिक्षित कलाकृतियां पहाड़ की संस्कृति को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नई पहचान दिला रही हैं।
  • फूड प्रोसेसिंग (खाद्य प्रसंस्करण): पहाड़ के शुद्ध और स्थानीय उत्पादों की शेल्फ-लाइफ बढ़ाने और उन्हें सही बाजार दिलाने के लिए वे फूड प्रोसेसिंग के क्षेत्र में महिलाओं को सशक्त कर रही हैं।

स्वयं सहायता समूहों के जरिए ‘स्वावलंबन’ की नई क्रांति

कविता जी के इस अभियान की सबसे खूबसूरत कड़ी हैं—पहाड़ की वो ग्रामीण महिलाएं और स्वयं सहायता समूह (SHGs) जो उनसे जुड़े हैं। कविता जी कहती हैं:

“इन महिलाओं की उम्मीदें और मुझ पर इनका अटूट विश्वास ही मेरी सबसे बड़ी ताकत और प्रेरणा हैं।”

वे केवल एक मार्गदर्शक नहीं हैं, बल्कि धरातल पर उतरकर महिलाओं की वास्तविक ज़रूरतों को समझती हैं। उन्हें सही कौशल विकास (Skill Development) का प्रशिक्षण देना, वित्तीय रूप से साक्षर बनाना और उनके उत्पादों को सही बाज़ार (Market Linkage) दिलाना उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है।

जब रास्ते बंद हो रहे हों, तब नया रास्ता बनाने का साहस ही असली नेतृत्व कहलाता है। वैश्विक महामारी कोरोना काल के उस दौर में, जब चारों तरफ आर्थिक अनिश्चितता थी और रोज़गार के अवसर सिमट रहे थे, उत्तराखंड के हल्द्वानी (नैनीताल) की एक महिला ने चुनौतियों के आगे झुकने के बजाय अपनी तकदीर और तस्वीर खुद बदलने का फैसला किया। यह कहानी है कविता बिष्ट ऐरी की, जिन्होंने मात्र ₹2,000 की न्यूनतम पूंजी से अपने घर के कोने से एक छोटे से व्यवसाय की शुरुआत की और आज वे ग्रामीण आजीविका व महिला सशक्तिकरण की एक सशक्त मिसाल बन चुकी हैं।

संकट को बदला अवसर में: ₹2,000 से आत्मनिर्भरता का सफर

कोरोना काल में जब पारिवारिक और आर्थिक परिस्थितियाँ कठिन थीं, तब कविता जी ने अपने भीतर के अटूट संकल्प को जगाया। अपनी मेहनत, लगन और कुछ नया सीखने की निरंतर इच्छा के बल पर उन्होंने कदम आगे बढ़ाए। आज वे किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं, बल्कि तीन अलग-अलग विधाओं में अपनी कला और व्यावसायिक कुशलता का लोहा मनवा रही हैं:

  • रेशम (Silk) पेंटिंग: रेशमी धागों और कपड़ों पर कला के बेहतरीन रंग उकेरना, जिसे राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिल रही है।
  • ऐपण (Aipan) पेंटिंग: उत्तराखंड की पारंपरिक और लोक सांस्कृतिक धरोहर ‘ऐपण’ को आधुनिक बाज़ार के उत्पादों से जोड़कर उसे सहेजने का काम।
  • फूड प्रोसेसिंग (खाद्य प्रसंस्करण): पहाड़ के स्थानीय और शुद्ध कृषि उत्पादों का मूल्य संवर्धन (Value Addition) कर उन्हें नई पहचान दिलाना।

अकेले शुरू हुआ सफर, अब बना कारवां

कविता जी की सफलता केवल उनकी व्यक्तिगत तरक्की तक सीमित नहीं है। आज उनके साथ पहाड़ की अनेक ग्रामीण महिलाएँ और कई स्वयं सहायता समूह (SHGs) कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे हैं। कविता जी कहती हैं:

“मेरे साथ जुड़ी महिलाओं की उम्मीदें और उनका विश्वास ही मेरी सबसे बड़ी प्रेरणा हैं। यदि महिलाओं को दृढ़ संकल्प और सही दिशा मिले, तो एक छोटी सी शुरुआत भी समाज में बहुत बड़ा बदलाव ला सकती है।”

वे इन महिलाओं को केवल रोज़गार नहीं दे रही हैं, बल्कि उन्हें सही मार्गदर्शन, कौशल विकास (Skill Development) का प्रशिक्षण और नए बाज़ारों से जोड़कर पूरी तरह आत्मनिर्भर बना रही हैं ताकि वे भी अपने परिवार के विकास में सम्मानजनक भूमिका निभा सकें।

सराहना, सम्मान और भविष्य का संकल्प

कविता जी के इन निस्वार्थ प्रयासों को विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और नेतृत्व मंचों पर न केवल सराहा गया है, बल्कि उन्हें प्रतिष्ठित सम्मानों से भी नवाजा गया है। उनका दृढ़ विश्वास है कि यदि किसी महिला को सही दिशा और अवसर मिले, तो वह न केवल अपना बल्कि पूरे समाज का भाग्य बदल सकती है।

भविष्य का लक्ष्य: कविता बिष्ट ऐरी जी का अगला कदम अपने इस कार्य को और अधिक व्यापक बनाना है। वे उत्तराखंड के दूरदराज के क्षेत्रों तक पहुँचकर अधिक से अधिक युवाओं और महिलाओं को स्वरोज़गार से जोड़ना चाहती हैं, ताकि ‘एक कदम पहाड़ की ओर’ बढ़ते हुए यहाँ के पारंपरिक उत्पादों को वैश्विक पहचान मिल सके।

आज के दौर में जब युवा केवल पारंपरिक नौकरियों के पीछे भाग रहे हैं, उत्तराखंड की साक्षी बेलवाल जैसी आत्मनिर्भर और रचनात्मक उद्यमी समाज में एक नई मिसाल पेश कर रही हैं। शिक्षा और रचनात्मकता के अनूठे संगम से उन्होंने न केवल अपना एक अलग रास्ता चुना, बल्कि आज वे ‘Divadangles’ ब्रांड के जरिए हस्तशिल्प और महिला सशक्तिकरण को एक नई दिशा दे रही हैं।

शिक्षा और रचनात्मकता का एक अनूठा संगम

साक्षी बेलवाल की शैक्षणिक पृष्ठभूमि आम उद्यमियों से काफी अलग और समृद्ध है। उन्होंने समाजशास्त्र (Sociology) और इंटीरियर डिजाइनिंग में मास्टर डिग्री हासिल की है। समाजशास्त्र की पढ़ाई ने जहाँ उन्हें समाज और मानवीय संवेदनाओं को गहराई से समझने में मदद की, वहीं इंटीरियर डिजाइनिंग ने उनके भीतर छिपी रचनात्मकता, रंगों के चयन और सौंदर्यशास्त्र (aesthetics) को निखारा। अपनी इसी समझ को उन्होंने अपनी कला में पिरोया और जन्म हुआ ‘Divadangles’ का।

क्या है ‘Divadangles’?

Divadangles एक प्रीमियम हैंडमेड क्रोशिया (crochet) ब्रांड है, जो रचनात्मकता, भव्यता और भावनाओं को धागों के माध्यम से एक नया रूप देता है। यह ब्रांड केवल उत्पाद नहीं बेचता, बल्कि हर उत्पाद के साथ एक कहानी और अपनापन जोड़ता है। यहाँ हर एक पीस को मशीन से नहीं, बल्कि हाथों से बेहद प्यार, देखभाल और बारीकी के साथ तैयार किया जाता है, जो इसे मशीनी दौर में भी बेहद खास और टिकाऊ बनाता है।

इस ब्रांड के तहत कई तरह के आकर्षक प्रोडक्ट्स तैयार किए जाते हैं, जिनमें शामिल हैं:

  • स्टाइलिश फैशन एक्सेसरीज: हाथ से बुने हुए बेहद खूबसूरत क्रोशिया बैग्स, पर्स और ट्रेंडी क्लच।
  • होम एंड लाइफस्टाइल: घर की खूबसूरती बढ़ाने वाले आकर्षक डेकोर आइटम्स और सदाबहार क्रोशिया के फूल।
  • विशेष उपहार (Customized Gifts): नवजात शिशुओं के लिए सुरक्षित और आरामदायक प्रोडक्ट्स और ग्राहकों की पसंद के अनुसार तैयार किए गए कस्टमाइज्ड गिफ्ट्स।

सिर्फ बिजनेस नहीं, महिला सशक्तिकरण की एक मुहिम

साक्षी का दृष्टिकोण केवल एक सफल बिजनेस खड़ा करने तक सीमित नहीं है। उनका असली विजन समाज की उन महिलाओं को आगे लाना है जो आत्मनिर्भर बनना चाहती हैं। ‘Divadangles’ के माध्यम से वे ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों की महिलाओं को क्रोशिया बुनाई का विशेष प्रशिक्षण दे रही हैं।

इस पहल के जरिए वे:

  1. उद्यमिता को बढ़ावा: महिलाओं में खुद का काम शुरू करने का आत्मविश्वास जगा रही हैं।
  2. स्थायी आजीविका: महिलाओं को घर बैठे आत्मनिर्भर बनने और सम्मानजनक कमाई करने के अवसर दे रही हैं।
  3. सांस्कृतिक संरक्षण: आधुनिक दौर में लुप्त हो रही पारंपरिक हस्तशिल्प कला को पुनर्जीवित कर रही हैं।

निष्कर्ष: पहाड़ों से प्रेरणा लेता एक सफर

साक्षी बेलवाल और उनका ब्रांड ‘Divadangles’ इस बात का जीवंत उदाहरण है कि यदि आपके पास सही दृष्टिकोण, अपनी संस्कृति के प्रति सम्मान और कुछ करने का जज्बा हो, तो आपकी शिक्षा और हुनर मिलकर समाज में एक बड़ा और सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं।

साक्षी न केवल अपनी कला को सहेज रही हैं, बल्कि कई अन्य महिलाओं के जीवन में भी आत्मनिर्भरता का उजियारा फैला रही हैं। उनकी यह यात्रा हर उस युवा के लिए एक महान प्रेरणा है जो अपनी जड़ों, अपने ‘पहाड़’ और अपनी संस्कृति से जुड़कर समाज के लिए कुछ नया और सार्थक करने का सपना देखता है।

उत्तराखंड के जंगलों को दहलाने वाली ‘चीड़ की पत्तियाँ’ (पिरूल) अब अभिशाप नहीं, बल्कि आजीविका का जरिया बन चुकी हैं। यह बदलाव मुमकिन हुआ है मंजू रौतेला साह के अथक प्रयासों से, जिन्हें आज पूरी दुनिया ‘पिरूल वुमेन’ के नाम से जानती है।

जब कचरा बना कुबेर का खजाना

उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में चीड़ के पेड़ों से झड़ने वाली पत्तियाँ, जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘पिरूल’ कहा जाता है, दशकों तक वन विभाग और ग्रामीणों के लिए सिरदर्द बनी रहीं। ये पत्तियाँ न केवल फिसलन का कारण थीं, बल्कि जंगलों में लगने वाली भीषण आग के लिए भी सबसे बड़ा ईंधन साबित होती थीं। लेकिन, बागेश्वर की बेटी और वर्तमान में अल्मोड़ा के द्वाराहाट में रहने वाली मंजू रौतेला साह ने इन पत्तियों में छिपे हुनर को पहचाना।

संघर्ष से सृजन तक का सफर

मंजू का जीवन किसी भी फिल्म की पटकथा से कम संघर्षपूर्ण नहीं है। मात्र तीसरी कक्षा में अपने पिता को खोने वाली मंजू ने कम उम्र में ही जिम्मेदारियों का बोझ उठाना सीख लिया था। उनकी शिक्षा बागेश्वर से हल्द्वानी और भीमताल तक रही। विवाह के बाद जब उन्होंने अपने गृहस्थ जीवन की शुरुआत की, तो उनकी मौसेरी बहन पूजा ने उन्हें ‘वेस्ट से बेस्ट’ बनाने की कला की ओर प्रेरित किया। वर्ष 2010 से शुरू हुआ यह सफर आज एक बड़े सामाजिक आंदोलन का रूप ले चुका है।

कला और पर्यावरण का संगम

मंजू केवल उत्पाद नहीं बनातीं, बल्कि वे एक पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) तैयार कर रही हैं। उनके द्वारा पिरूल से निर्मित:

  • सजावट और दैनिक उपयोग: फूलदान, टोकरी, पूजा थाल, पेन स्टैंड, और डाइनिंग मैट।
  • उपयोगी वस्तुएं: बैठने के आसन, पायदान और स्टाइलिश हैट।
  • सांस्कृतिक प्रतीक: रक्षाबंधन के समय पिरूल से बनी अनोखी राखियाँ, जिनकी डिमांड देश-विदेश तक है।
  • फैशन एक्सेसरीज़: पिरूल से बनी आकर्षक हैट, ईयर रिंग, पेंडेंट, अंगूठी और पर्स।
  • आधुनिक उपयोग: टी कोस्टर और मोबाइल चार्जिंग पॉकेट।

सीमा से परे प्रेरणा

मंजू की सफलता का पैमाना केवल उनके अपने उत्पाद नहीं, बल्कि वे महिलाएं हैं जिन्हें उन्होंने प्रशिक्षित किया है। राजकीय बालिका इंटर कॉलेज, ताड़ीखेत में प्रयोगशाला सहायक के रूप में काम करते हुए उन्होंने छात्राओं और शिक्षिकाओं को इस हुनर से लैस किया। आज उनके नक्शे कदम पर चलकर उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि हिमाचल और झारखंड की महिलाएं भी स्वरोजगार का मार्ग अपना रही हैं।

उपलब्धियां और सम्मान

वर्ष 2019 में कोलकाता में आयोजित ‘इण्डिया इंटरनेशनल साइंस फेस्टिवल’ में ‘बेस्ट अपकमिंग आर्टिस्ट’ का अवार्ड पाकर उन्होंने सिद्ध कर दिया कि पहाड़ की प्रतिभा को सही दिशा मिले तो वह वैश्विक मंच पर चमक सकती है। उन्हें शिक्षा में शून्य निवेश नवाचार के लिए प्रशस्ति पत्र भी मिला है।

2026 – पीरूल वूमेन मंजू‌ साह रौतेला को गौरा‌देवी सम्मान दिया गया।

निष्कर्ष: एक नई दिशा

मंजू रौतेला साह का संदेश स्पष्ट है—पलायन किसी समस्या का समाधान नहीं है। यदि हम अपने आसपास मौजूद संसाधनों का सही और नवाचारी तरीके से उपयोग करें, तो पहाड़ में भी अवसरों की कमी नहीं है। मंजू आज न केवल सैकड़ों महिलाओं की प्रेरणास्त्रोत हैं, बल्कि यह भी साबित कर रही हैं कि पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक समृद्धि को एक साथ साधा जा सकता है।

संपादक की कलम से:

राष्ट्रप्रभात के इस अंक में मंजू रौतेला साह की कहानी यह बताती है कि पहाड़ की समस्याएं हमें पलायन के लिए नहीं, बल्कि नवाचार (Innovation) के लिए आमंत्रित करती हैं। मंजू जी जैसी शख्सियतें साबित करती हैं कि यदि संकल्प अटल हो, तो चीड़ की सूखी पत्तियाँ भी सोने जैसी चमक बिखेर सकती हैं।

दिनांक 16 मई 2026, दिन रविवार को गाज़ियाबाद में माननीय नगर आयुक्त महोदय द्वारा उत्तराखंड समाज की एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई, जिसमें नंदग्राम स्थित “उत्तराखंड भवन” को पूर्ण रूप से उत्तराखंड समाज को समर्पित किए जाने की घोषणा की गई। इस अवसर पर नगर आयुक्त महोदय ने भवन के निर्माण एवं संचालन हेतु वर्षों से निरंतर प्रयासरत सामाजिक संगठनों, समाजसेवियों एवं उत्तराखंड समाज के सभी लोगों का आभार व्यक्त किया। विशेष रूप से भारतीय पर्वतीय महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अनुपम सिंह भंडारी जी के प्रयासों एवं सक्रिय भूमिका की सराहना की गई।

ज्ञात हो कि जब भारतीय पर्वतीय महासभा की दिल्ली-NCR टीम को यह जानकारी मिली कि अनेक प्रयासों के बावजूद उत्तराखंड भवन का संचालन प्रारम्भ नहीं हो पा रहा है, तब महासभा ने इस विषय को गंभीरता से उठाया। इसके पश्चात महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अनुपम सिंह भंडारी जी के नेतृत्व में केंद्रीय कार्यकारिणी द्वारा माननीय मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ जी को ज्ञापन सौंपकर भवन का शीघ्र संचालन प्रारम्भ कराने की मांग की गई, जिस पर मुख्यमंत्री जी ने तत्काल संज्ञान लेते हुए संबंधित अधिकारियों को आवश्यक निर्देश दिए।

उत्तराखंड भवन के निर्माण की ऐतिहासिक घोषणा महाकौथिक के मंच से की गई थी, जिसके लिए राजेन्द्र चौहान जी एवं महाकौथिक की समस्त टीम का उत्तराखंड समाज आभार व्यक्त करता है।

इस अवसर पर श्री दिनेश लखेड़ा जी, श्री सच्चिदानंद शर्मा जी, पूर्व पार्षद श्रीमती मीना भंडारी जी, श्री बालम सिंह बिष्ट जी एवं माननीय पार्षद श्री हरिश कड़ाकोटी जी सहित सभी वरिष्ठजनों एवं समाजसेवियों के योगदान को भी विशेष रूप से सराहा गया।

साथ ही भारतीय पर्वतीय महासभा की दिल्ली-NCR शाखा से श्री अभिनव सिंह भंडारी जी, श्री भुवन चंद पांडे जी, श्री रोहित रावत जी, श्री दीपक रावत जी, श्री सतीश भारद्वाज जी, श्री अनिल वर्मा जी, श्री बी.डी. उप्रेती जी एवं श्री हेमंत जोशी जी के सहयोग एवं समर्पण की भी सराहना की गई।

महासभा द्वारा बताया गया कि सदस्यता शुल्क एवं संचालन से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण मांगों को लेकर समाज का प्रयास आगे भी निरंतर जारी रहेगा।

5 मई 2026 को दिल्ली इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल जैसे बड़े मंच पर उत्तराखंडी फीचर फिल्म ‘घंगतोल’ की स्क्रीनिंग हुई। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA) जैसे प्रतिष्ठित स्थान पर क्षेत्रीय सिनेमा का प्रदर्शन होना हमारी संस्कृति की बढ़ती पहुंच और पहचान का प्रमाण है।

जब दिल्ली जैसे महानगरों में रहने वाला उत्तराखंडी समाज अपनी जड़ों से जुड़ी फिल्म देखने के लिए उमड़ता है, तो यह केवल मनोरंजन नहीं बल्कि एक सांस्कृतिक एकजुटता का प्रतीक बन जाता है।

इस स्क्रीनिंग के कुछ खास मायने:

  • सांस्कृतिक गौरव: प्रवासी उत्तराखंडियों के लिए यह अपनी भाषा, संगीत और रीति-रिवाजों को बड़े पर्दे पर अनुभव करने का एक भावुक पल रहा होगा।
  • युवा पीढ़ी का जुड़ाव: दिल्ली जैसे शहरों में पली-बढ़ी नई पीढ़ी को अपनी ‘पौराणिक धरोहर’ और पहाड़ों की वास्तविकता को समझने का मौका मिला।
  • सिनेमाई पहचान: उत्तराखंडी सिनेमा अब केवल क्षेत्रीय स्तर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल्स में अपनी जगह बनाकर वैश्विक पहचान की ओर अग्रसर है।

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA) में ‘घंगतोल’ फिल्म के कलाकारों से मिलने का अवसर मिला। पहाड़ की संस्कृति और रीति-रिवाजों को सहेजने की दिशा में इस तरह के प्रयास वाकई सराहनीय हैं।

आज के समय में जब आधुनिकता की दौड़ में हम अपनी जड़ों को भूलते जा रहे हैं, तब ऐसी फिल्में समाज को आईना दिखाने का काम करती हैं। ‘घंगतोल’ जैसी फिल्में न केवल हमारी पौराणिक धरोहर को पुनर्जीवित करती हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ी को अपनी मिट्टी से जुड़ने की प्रेरणा भी देती हैं।

पहाड़ की संस्कृति और पुरानी परंपराओं को फिर से जीवित करने का आपका संकल्प बहुत महत्वपूर्ण है। अपनी विरासत पर गर्व करना और उसे अपनी जीवनशैली में वापस लाना ही अपनी पहचान को बचाए रखने का एकमात्र तरीका है।

उम्मीद है कि यह फिल्म जन-जन तक पहुंचेगी और लोगों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों की ओर लौटने के लिए प्रेरित करेगी।

पश्चिम बंगाल के राजनीतिक इतिहास में एक ऐतिहासिक बदलाव आया है। 4 मई 2026 को घोषित विधानसभा चुनाव परिणामों के अनुसार, भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने पहली बार राज्य में पूर्ण बहुमत हासिल कर सरकार बनाने का मार्ग प्रशस्त किया है।

इस चुनाव के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

  • ऐतिहासिक बहुमत: भाजपा ने 294 सदस्यीय विधानसभा में 206 सीटें जीतकर दो-तिहाई से अधिक बहुमत हासिल किया है।

  • सत्तारूढ़ दल की हार: ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस (TMC) का 15 साल पुराना शासन समाप्त हो गया है। TMC को इस बार केवल 81 सीटों पर संतोष करना पड़ा।

  • बड़ा उलटफेर: मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को उनके ही गढ़ भवानीपुर सीट पर भाजपा के शुभेंदु अधिकारी ने 15,105 वोटों के अंतर से हराया।

  • अन्य परिणाम: कांग्रेस और आम जनता उन्नयन पार्टी (AJUP) को 2-2 सीटें मिलीं, जबकि माकपा (CPI-M) को केवल 1 सीट मिली।

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने इस जीत को “सुशासन की राजनीति की जीत” बताया और कहा कि अब बंगाल “भय से मुक्त” हो गया है। 1972 के बाद यह पहली बार होगा जब पश्चिम बंगाल में उसी दल की सरकार होगी जो केंद्र में भी सत्ता में है।

भारतीय पर्वतीय समाज के हितों एवं समग्र विकास को लेकर एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए भारतीय पर्वतीय महासभा के प्रतिनिधिमंडल ने उत्तर प्रदेश के माननीय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी से लोक भवन, लखनऊ में शिष्टाचार भेंट की । इस दौरान प्रतिनिधिमंडल ने क्षेत्रीय विकास, सांस्कृतिक संरक्षण एवं बुनियादी सुविधाओं से जुड़े अहम विषयों पर चर्चा करते हुए विभिन्न मांगों से संबंधित पत्र एवं ज्ञापन सौंपे।
प्रतिनिधिमंडल ने आगामी “पंचम वार्षिक उत्सव कार्यक्रम” में मुख्यमंत्री जी को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया । यह आयोजन पर्वतीय संस्कृति, लोक कला और सामाजिक एकता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से आयोजित किया जा रहा है,
उत्तर प्रदेश सरकार जिससे नई पीढ़ी को अपनी परंपराओं से जोड़ने का अवसर मिलेगा। महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अनुपम सिंह भंडारी ने लखनऊ – हल्द्वानी प्रस्तावित गोमती एक्सप्रेसवे के शीघ्र निर्माण हेतु आवेदन प्रस्तुत
किया । इस लगभग 300 किमी लंबे एक्सप्रेसवे से यात्रा समय में कमी आएगी और पर्यटन, व्यापार व क्षेत्रीय विकास को गति मिलेगी। साथ ही, नंदग्राम (गाजियाबाद) स्थित ” उत्तराखंड भवन” के संचालन एवं प्रबंधन
को लेकर भी ज्ञापन दिया गया,
जिसमें संयुक्त प्रबंधन समिति के गठन एवं पारदर्शी बुकिंग व्यवस्था की मांग रखी गई। प्रतिनिधिमंडल ने सभी प्रस्तावों को जनहित एवं पर्वतीय समाज के उत्थान से जुड़ा बताते हुए प्राथमिकता के आध र पर कार्यवाही का अनुरोध किया। इस अवसर पर पान सिंह भंडारी, दया कृष्ण डालाकोटी, दिनेश उप्रेती सहित अन्य सदस्य उपस्थित रहे । माननीय मुख्यमंत्री योगी जी ने सभी विषयों को गंभीरता से सुनते हुए आवश्यक कार्यवाही का आश्वासन दिया । यह भेंट पर्वतीय समाज के लिए एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है, जिससे भविष्य में विकास कार्यों को नई गति मिलने की संभावना है। इस पहल से आने वाले समय में पर्वतीय समाज के बुनियादी ढांचे और सांस्कृतिक कार्यक्रमों को सरकारी स्तर पर अधिक बल मिलने की उम्मीद है।