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देवभूमि उत्तराखंड के रामनगर का यह नायाब हीरा, मुकेश सुयाल, आज उन हजारों युवाओं के लिए रोल मॉडल है जो समाज सेवा करना चाहते हैं। उनका कार्य यह याद दिलाता है कि दुआएं कमाने के लिए किसी पद की नहीं, बस एक साफ दिल की जरूरत होती है।मुकेश सुयाल जी जैसे लोग समाज के वे स्तंभ हैं, जो बिना किसी शोर-शराबे के चुपचाप मानवता की सेवा में जुटे रहते हैं। रामनगर की सुंदर वादियों के बीच उनकी इस नेकदिली की चर्चा अब हर जुबान पर है। मुकेश जी ने उन बच्चियों को केवल ईंट-पत्थरों का मकान नहीं दिया, बल्कि उन्हें “भयमुक्त भविष्य” और “आत्मसम्मान” उपहार में दिया है। रामनगर और पूरी देवभूमि को अपने इस बेटे पर गर्व होना चाहिए।

मुकेश सुयाल: रामनगर का वह ‘नायाब हीरा’ जिसने इंसानियत को मजहब से ऊपर रखा

मुकेश सुयाल। रामनगर के इस व्यक्तित्व ने यह सिद्ध कर दिया है कि दुआएं कमाने के लिए किसी ऊंचे पद या सत्ता की नहीं, बल्कि एक साफ़ दिल और अटूट संकल्प की जरूरत होती है।

मरते पिता का वचन

इंसानियत की सबसे भावुक मिसाल तब देखने को मिली जब एक बेबस पिता ने अपनी अंतिम सांसें गिनते हुए मुकेश भाई का हाथ थामा और अपनी बेटियों का भविष्य उन्हें सौंप दिया। उस पिता ने कहा था— “मुकेश भाई, मेरी बच्चियों को अकेला मत छोड़ना, उनके लिए एक घर बना देना।”

जहाँ दुनिया वादे करके भूल जाती है, वहीं मुकेश सुयाल ने इस वचन को किसी पवित्र अनुष्ठान की तरह लिया। टूटी-फूटी झोपड़ी में रहने वाली उन बिन माँ-बाप की बच्चियों के लिए मुकेश जी ने रात-दिन एक कर दिया और मात्र १० दिनों के भीतर एक पक्का घर तैयार कर खड़ा कर दिया। जब वे बच्चियां पहली बार उस चौखट के अंदर गईं, तो उनकी आँखों से बहते आंसू इस बात के गवाह थे कि अब वे इस दुनिया में अनाथ नहीं हैं। मुकेश जी ने उन्हें केवल छत नहीं दी, बल्कि एक “भयमुक्त भविष्य” और “आत्मसम्मान” उपहार में दिया।

मृत्यु के बाद का सम्मान: मजहब से ऊपर इंसानियत

आज के दौर में जहाँ समाज अक्सर धर्म और दीवारों में बंटा नजर आता है, वहाँ मुकेश सुयाल साम्प्रदायिक सौहार्द की एक जीवंत मिसाल पेश कर रहे हैं। वे केवल जीवित लोगों के मददगार नहीं हैं, बल्कि वे उन लावारिस मृत आत्माओं के भी रक्षक हैं जिनका इस दुनिया में कोई नहीं बचा।

मुकेश जी लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार उनके धर्म के अनुसार करते हैं। यदि मृतक हिंदू है, तो वे पूरे विधि-विधान से मुखाग्नि देते हैं और यदि मुस्लिम है, तो पूरी शिद्दत के साथ उन्हें सुपुर्द-ए-खाक (दफन) करते हैं। यह कार्य हर इंसान को मरने के बाद सम्मान पाने का अधिकार सुनिश्चित करता है।

मुकेश सुयाल जी की समाज सेवा किसी एक दायरे में सीमित नहीं है, बल्कि वे एक ‘सर्वांगीण सेवा’ के मिशन पर हैं:

  1. स्वास्थ्य (Health): अस्पतालों में सुबह-शाम मरीजों की तीमारदारी करना और गरीब परिवारों के लिए दवाओं का प्रबंध करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा है।
  2. आवास (Shelter): बेसहारा लोगों के सिर पर सुरक्षित छत बनाना।
  3. बुनियादी जरूरतें (Basics): जरूरतमंदों तक समय पर भोजन और वस्त्र पहुँचाना।
  4. अंतिम विदाई (Dignity): लावारिस देह को ससम्मान विदाई देना।

युवाओं के लिए रोल मॉडल

बिना किसी शोर-शराबे और तामझाम के चुपचाप सेवा में जुटे मुकेश सुयाल आज उत्तराखंड के हजारों युवाओं के लिए एक ‘रोल मॉडल’ बन चुके हैं। उनका जीवन सिखाता है कि समाज सेवा केवल धन से नहीं, बल्कि शारीरिक श्रम और संवेदना से होती है। रामनगर और पूरी देवभूमि को अपने इस बेटे पर गर्व है।


मदद करने का जज्बा रखिए, रास्ते अपने आप बन जाएंगे

जीते जी तो सब अपनों की सेवा करते हैं, असली इंसान वही जो गैरों की मैयत को कंधा दे जाए और अनाथों का हाथ थाम ले।


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