TT Ads

थाली में पोषण, पर खुद की झोली खाली

देश के सरकारी स्कूलों में ‘मिड-डे मील’ योजना की रीढ़ मानी जाने वाली भोजन माताएं आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ी हैं, जहाँ उनकी 25 साल की सेवा के बदले उन्हें केवल ₹3000 प्रति माह का ‘मानदेय’ मिल रहा है। यह लेख उन महिलाओं की आवाज़ है जो हज़ारों बच्चों का पेट तो भरती हैं, लेकिन खुद की रसोई चलाने के लिए संघर्ष कर रही हैं।

1. सशक्तिकरण के दावों की जमीनी हकीकत

सरकारें मंचों से ‘महिला सशक्तिकरण’ और ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ जैसे नारों का उद्घोष करती हैं। लेकिन जब हम भोजन माताओं की आर्थिक स्थिति देखते हैं, तो यह नारे खोखले नजर आते हैं।

  • दैनिक आय: ₹3000 प्रति माह का मतलब है ₹100 प्रतिदिन।

  • तुलना: यह आय मनरेगा की मजदूरी और अकुशल श्रमिकों के न्यूनतम वेतन से भी आधी है।

2. ‘मानदेय’ के पीछे छुपा शोषण

प्रशासनिक शब्दावली में इन्हें ‘कर्मचारी’ नहीं बल्कि ‘स्वयंसेवक’ माना जाता है, इसलिए इन्हें ‘वेतन’ के बजाय ‘मानदेय’ दिया जाता है।

  • 25 साल का अनुभव: क्या ढाई दशक की निष्ठा के बाद भी कोई पदोन्नति या वेतन वृद्धि नहीं होनी चाहिए?

  • बिना छुट्टियों के काम: कई राज्यों में इन्हें साल के केवल 10 महीने का पैसा दिया जाता है, जैसे कि जून की छुट्टियों में उन्हें भूख न लगती हो।

3. काम का बोझ और सामाजिक सुरक्षा का अभाव

भोजन माता का काम सिर्फ खाना बनाना नहीं है। इसमें शामिल है:

  • राशन का प्रबंधन और सफाई।

  • भारी बर्तनों और चूल्हे के धुएं के बीच काम करना।

  • शून्य सुरक्षा: काम के दौरान दुर्घटना या बीमारी होने पर सरकार की ओर से कोई चिकित्सा सुविधा या बीमा कवर नहीं मिलता।

4. भोजन माताओं की प्रमुख मांगें

लेख के इस हिस्से में उनकी मांगों को प्रमुखता से रखें:

  1. न्यूनतम मजदूरी: कम से कम ₹15,000 से ₹18,000 प्रति माह का मानदेय।

  2. राज्य कर्मचारी का दर्जा: वर्षों की सेवा के आधार पर स्थायीकरण।

  3. पेंशन योजना: रिटायरमेंट के बाद सम्मानजनक जीवन जीने के लिए आर्थिक मदद।

  4. समान कार्य, समान वेतन: अन्य चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की तरह सुविधाएं।


निष्कर्ष: अब न्याय की बारी

भोजन माताओं का सवाल सरकार के अंतर्मन पर एक चोट है। यदि राष्ट्र के भविष्य (बच्चे) को पोषण देने वाली महिलाएं खुद कुपोषण और गरीबी की शिकार होंगी, तो हम एक ‘विकसित भारत’ की कल्पना कैसे कर सकते हैं? सशक्तिकरण तब होगा जब उनके हाथों को केवल काम नहीं, बल्कि उनके श्रम का उचित मूल्य और सामाजिक सम्मान भी मिलेगा।

https://www.youtube.com/watch?v=tp7Y0Hn_fgk

TT Ads

2 Replies to “25 साल से सिर्फ ₹3000 वेतन! क्या यही है महिला सशक्तिकरण?”

  • peptides online
    peptides online

    Really well explained, the part about peptide lab protocols was backed by solid info, this answered my questions.

  • plus777asialogin
    plus777asialogin

    Finally a platform that understands what Asian players need. The login is secure and the customer support is actually helpful. Great job plus777asialogin.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *