शहीद केसरी चंद जी की यह गाथा और जौनसार-बावर की यह अटूट देशभक्ति हर भारतीय के लिए गर्व का विषय है। नेताजी सुभाष चंद्र बोस का उत्तराखंड के रणबांकुरों पर अटूट विश्वास इस बात का प्रमाण है कि हमारी देवभूमि ‘वीरभूमि’ भी है।
एक वीर का जीवन परिचय: केसरी चंद का जन्म 1 नवंबर 1920 को जौनसार-बावर के क्यावा गांव में हुआ था। उनकी रगों में देशभक्ति का ज्वार था, जो उन्हें द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नेताजी सुभाष चंद्र बोस की ‘आजाद हिंद फौज’ (INA) की ओर ले गया। वे ‘आजाद हिंद फौज’ के एक निष्ठावान और पराक्रमी सैनिक बने।
सर्वोच्च बलिदान: इंफाल के मोर्चे पर ब्रिटिश सेना के खिलाफ अदम्य साहस का परिचय देते हुए, वे बंदी बना लिए गए थे। ब्रिटिश हुकूमत के दमन चक्र ने उन्हें डराने का बहुत प्रयास किया, लेकिन उनके फौलादी इरादों को कोई डिगा न सका। अंततः, 3 मई 1945 को दिल्ली की ऐतिहासिक तिहाड़ जेल में उन्हें फांसी दे दी गई।
कहा जाता है कि फांसी के फंदे पर चढ़ने से पहले, उन्होंने उसे हंसते-हंसते चूमा था। उनके ये अंतिम क्षण उनकी देश के प्रति अटूट निष्ठा और बलिदान का प्रतीक हैं। मात्र 24 वर्ष की आयु में, उन्होंने देश की आजादी के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया।
मेला: वीरता और संस्कृति का महोत्सव हर साल 3 मई को जौनसार-बावर चकराता में शहीद केसरी चंद के स्मारक स्थल (रामताल) पर एक भव्य मेले का आयोजन किया जाता है। यह मेला केवल एक मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह शहीद केसरी चंद की वीरता और जौनसार-बावर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का जश्न है।
मेले की शुरुआत शहीद केसरी चंद की प्रतिमा पर माल्यार्पण और उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर देने के साथ होती है। इस अवसर पर देश के विभिन्न हिस्सों से आए लाखों लोग अपने वीर सपूत को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।
सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण: यह मेला जौनसारी संस्कृति का एक जीवंत उदाहरण है। स्थानीय कलाकार पारंपरिक वेशभूषा में हारुल, तांदी और रासो जैसे लोक नृत्य प्रस्तुत करते हैं। ये नृत्य और संगीत न केवल दर्शकों का मन मोह लेते हैं, बल्कि वे क्षेत्र की परंपराओं और लोककथाओं को भी जीवंत रखते हैं।
सामाजिक मिलन और महत्व: जौनसार-बावर क्षेत्र के हजारों लोग अपनी परंपराओं को जीवित रखने और अपने नायक को याद करने के लिए यहाँ एकत्र होते हैं। यह मेला सामाजिक मिलन का एक महत्वपूर्ण अवसर है, जहाँ लोग एक-दूसरे से मिलते हैं, अपनी खुशियाँ साझा करते हैं और अपनी संस्कृति को और मजबूत करते हैं।
यह मेला नई पीढ़ी को उत्तराखंड के वीर सपूतों के बलिदान से अवगत कराने और क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को संजोने का एक सशक्त माध्यम है। शहीद केसरी चंद का जीवन आज भी हमें प्रेरणा देता है कि हम अपने देश के प्रति निष्ठावान रहें और उसकी रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहें।





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