उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र की वादियों से उठी एक छोटी सी पहल आज सात समंदर पार अपनी धाक जमा रही है। हल्द्वानी के हल्दूचौड़ गांव की निवासी किरण जोशी ने यह साबित कर दिखाया है कि अगर इरादे बुलंद हों और सरकारी योजनाओं का सही मार्गदर्शन मिले, तो ग्रामीण महिलाएं न केवल अपना जीवन बदल सकती हैं, बल्कि पूरे समुदाय के लिए रोजगार के द्वार खोल सकती हैं।

₹30,000 का ऋण और सफलता की उड़ान

किरण ने प्रदेश सरकार की राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) योजना का लाभ उठाते हुए सहकारी बैंक से महज 30 हजार रुपये का शुरुआती ऋण लिया। इस छोटी सी पूंजी से उन्होंने ‘कालिका स्वयं सहायता समूह’ का गठन किया। शुरुआत में स्थानीय पहाड़ी व्यंजनों से काम शुरू करने वाली किरण ने आज 20 अन्य महिलाओं को जोड़कर एक सशक्त नेटवर्क खड़ा कर लिया है। वर्तमान में यह समूह सालाना 7 से 8 लाख रुपये की आय अर्जित कर रहा है।

स्थानीय स्वाद से लेकर पारंपरिक शिल्पकला तक समूह की महिलाएं शुद्ध पहाड़ी उत्पादों और शिल्प को बाजार में उतार रही हैं:

  • खान-पान उत्पाद: हर्बल टी, ग्रीन-टी, रायता मसाला, ककड़ी-मूंग दाल की बड़ी, पहाड़ी पीसी नून, सैनिक चने, मडुआ व मक्का बिस्कुट, लाल चावल, झंगोरा और जम्बू गंदारैणी।
  • पारंपरिक शिल्प व लोककला: रेशम पर ऐपण चित्रकारी, ऐपण स्टाइल के हैंडबैग और शॉल।

अमेरिका तक पहुँचा कुमाऊंनी ‘पिछौड़ा’ कुमाऊं के मांगलिक अवसरों पर पहना जाने वाला पारंपरिक परिधान ‘पिछौड़ा’ अब केवल पुराने ढर्रे तक सीमित नहीं है। किरण और उनके समूह की महिलाओं ने इसमें मोती, स्टोन वर्क और आधुनिक डिजाइन की कड़ाई का नया ट्रेंड जोड़ा है। इस प्रयोग को देहरादून, दिल्ली, लखनऊ ही नहीं बल्कि अमेरिका में रहने वाले प्रवासी भारतीयों द्वारा भी खूब सराहा जा रहा है। हाल ही में नवरात्रि उत्सव के दौरान ही समूह को 50 से अधिक स्पेशल ऑर्डर मिले।

स्थानीय जिला प्रशासन और डीएम ललित मोहन रयाल ने भी किरण की इस दूरदर्शिता और महिला सशक्तिकरण की मिसाल की सराहना की है। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स और देश भर के मेलों के माध्यम से यह ग्रामीण पहल ‘वोकल फॉर लोकल’ का जीवंत उदाहरण बन चुकी है।