“यदि पहाड़ का हुनर आगे बढ़ेगा, तो पहाड़ का भविष्य भी मजबूत होगा।” यह केवल एक विचार नहीं, बल्कि उस मुहिम का संकल्प है जो उत्तराखंड के सीमांत क्षेत्र मुनस्यारी से उठकर आज पूरे देश में अपनी गूंज सुना रही है। इस मुहिम के सारथी हैं—वीरेंद्र सिंह मपवाल। उत्तराखंड की हसीन वादियों में सिर्फ खूबसूरती ही नहीं, बल्कि संस्कृति और हुनर का एक अनमोल खजाना भी छुपा है। इसी समृद्ध संस्कृति, पारंपरिक अंगोरा शॉल, पशमीना और जोहार घाटी की पौराणिक हस्तशिल्प को सहेजने के साथ-साथ अपने शौका समुदाय के स्थानीय उत्पादों को देश के कोने-कोने तक पहुँचाने का सराहनीय कार्य वीरेंद्र सिंह मपवाल कर रहे हैं।
‘Himalayan Munsyari Store’: सिर्फ व्यापार नहीं, परंपरा का मंच
वीरेंद्र सिंह मपवाल द्वारा स्थापित “Himalayan Munsyari Store” केवल एक व्यावसायिक प्रतिष्ठान या दुकान नहीं है। यह असल में पहाड़ की जीवंत कला, सदियों पुरानी परंपरा और स्थानीय कारीगरों के सपनों को उड़ान देने का एक बेहद खूबसूरत और ईमानदार प्रयास है।
इस स्टोर में कदम रखते ही आपको उत्तराखंड की मिट्टी की खुशबू का अहसास होगा। स्टोर की खासियतें कुछ इस प्रकार हैं:
पारंपरिक शिल्प का अनूठा संग्रह: यहाँ उच्च गुणवत्ता वाले ऊनी वस्त्र, विश्वप्रसिद्ध पश्मीना, बेहद सुकोमल अंगोरा उत्पाद और जोहार घाटी की पौराणिक हस्तशिल्प कला का बेहतरीन कलेक्शन उपलब्ध है।
कुमाऊँनी शैली की जीवंत झलक: स्टोर की आकर्षक सजावट और इसकी पारंपरिक कुमाऊँनी शैली हर आने वाले ग्राहक को सम्मोहित कर लेती है। यह स्टोर व्यापारिक केंद्र से ज्यादा उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर का एक छोटा संग्रहालय प्रतीत होता है।
हर उत्पाद के पीछे एक कहानी: यहाँ मिलने वाला प्रत्येक उत्पाद महज एक वस्तु नहीं है, बल्कि उसके पीछे उत्तराखंड के बुनकरों की कड़ी मेहनत, उनकी पीढ़ियों पुरानी परंपरा और पहाड़ों की आत्मीयता की एक अनकही कहानी छुपी है।
‘वोकल फॉर लोकल’ और आत्मनिर्भरता को नई दिशा
वीरेंद्र सिंह मपवाल का मुख्य उद्देश्य सिर्फ मुनाफा कमाना या व्यापार का विस्तार करना नहीं है। उनका असली मकसद सामाजिक और आर्थिक रूप से स्थानीय समाज को मजबूत करना है।
| मुख्य स्तंभ | प्रभाव और उद्देश्य |
| कारीगरों को उचित मंच | स्थानीय कारीगरों और छोटे उद्यमियों को एक ऐसा बाजार देना जहाँ बिचौलियों के बिना उन्हें सही दाम मिल सके। |
| महिला सशक्तिकरण | पहाड़ की महिलाओं के हुनर (जैसे बुनाई और हस्तशिल्प) को आर्थिक स्वतंत्रता में बदलना। |
| सांस्कृतिक संरक्षण | जोहार घाटी और शौका समुदाय की विलुप्त होती पारंपरिक कलाओं को नई पीढ़ी के बीच जीवित रखना। |
उनका यह विजन प्रधानमंत्री के “वोकल फॉर लोकल” के नारे को जमीनी स्तर पर सच साबित करता है और ‘आत्मनिर्भर उत्तराखंड’ की भावना को एक नई और मजबूत रीढ़ प्रदान करता है।
एक प्रेरणादायक पहल
पलायन के दंश को झेलते पहाड़ों के बीच वीरेंद्र सिंह मपवाल जैसे लोग उम्मीद की एक नई किरण बनकर उभरे हैं। उन्होंने यह साबित कर दिया है कि यदि सही नीयत और अपनी जड़ों के प्रति सम्मान हो, तो स्थानीय स्तर पर रहकर भी वैश्विक स्तर की पहचान बनाई जा सकती है।
वीरेंद्र सिंह मपवाल का यह प्रयास वास्तव में उत्तराखंड की संस्कृति, हस्तशिल्प और स्थानीय उत्पादों को एक नई और गौरवमयी पहचान देने की दिशा में एक अत्यंत प्रेरणादायक और अनुकरणीय पहल है। पहाड़ के इस हुनर को सलाम!




