हल्द्वानी (नैनीताल)। पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी भले ही कभी यहाँ के काम न आने की कहावत रही हो, लेकिन आज उत्तराखंड की बेटियां इस सोच को बदल रही हैं। देवभूमि की समृद्ध संस्कृति, पारंपरिक लोक कला और ग्रामीण आजीविका को एक नया आयाम दे रही हैं—कविता बिष्ट ऐरी। हल्द्वानी की रहने वाली कविता जी आज किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। वे एक कुशल सामाजिक कार्यकर्ता, महिला सशक्तिकरण की मुखर आवाज़ और सैकड़ों ग्रामीण महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।
कला और संस्कृति को बनाया आजीविका का हथियार
कविता बिष्ट ऐरी जी ने उत्तराखंड की पारंपरिक धरोहर को सिर्फ सहेजने का काम नहीं किया, बल्कि उसे रोज़गार का एक ठोस जरिया बना दिया है। वे मुख्य रूप से तीन क्षेत्रों में अभूतपूर्व कार्य कर रही हैं:
- रेशम (Silk) पेंटिंग और ऐपण (Aipan): उत्तराखंड की लोक कला ‘ऐपण’ और बारीक ‘रेशम पेंटिंग’ के जरिए वे स्थानीय कला को आधुनिक बाज़ार के अनुरूप ढाल रही हैं। उनके द्वारा तैयार और प्रशिक्षित कलाकृतियां पहाड़ की संस्कृति को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नई पहचान दिला रही हैं।
- फूड प्रोसेसिंग (खाद्य प्रसंस्करण): पहाड़ के शुद्ध और स्थानीय उत्पादों की शेल्फ-लाइफ बढ़ाने और उन्हें सही बाजार दिलाने के लिए वे फूड प्रोसेसिंग के क्षेत्र में महिलाओं को सशक्त कर रही हैं।
स्वयं सहायता समूहों के जरिए ‘स्वावलंबन’ की नई क्रांति
कविता जी के इस अभियान की सबसे खूबसूरत कड़ी हैं—पहाड़ की वो ग्रामीण महिलाएं और स्वयं सहायता समूह (SHGs) जो उनसे जुड़े हैं। कविता जी कहती हैं:
“इन महिलाओं की उम्मीदें और मुझ पर इनका अटूट विश्वास ही मेरी सबसे बड़ी ताकत और प्रेरणा हैं।”
वे केवल एक मार्गदर्शक नहीं हैं, बल्कि धरातल पर उतरकर महिलाओं की वास्तविक ज़रूरतों को समझती हैं। उन्हें सही कौशल विकास (Skill Development) का प्रशिक्षण देना, वित्तीय रूप से साक्षर बनाना और उनके उत्पादों को सही बाज़ार (Market Linkage) दिलाना उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है।
जब रास्ते बंद हो रहे हों, तब नया रास्ता बनाने का साहस ही असली नेतृत्व कहलाता है। वैश्विक महामारी कोरोना काल के उस दौर में, जब चारों तरफ आर्थिक अनिश्चितता थी और रोज़गार के अवसर सिमट रहे थे, उत्तराखंड के हल्द्वानी (नैनीताल) की एक महिला ने चुनौतियों के आगे झुकने के बजाय अपनी तकदीर और तस्वीर खुद बदलने का फैसला किया। यह कहानी है कविता बिष्ट ऐरी की, जिन्होंने मात्र ₹2,000 की न्यूनतम पूंजी से अपने घर के कोने से एक छोटे से व्यवसाय की शुरुआत की और आज वे ग्रामीण आजीविका व महिला सशक्तिकरण की एक सशक्त मिसाल बन चुकी हैं।
संकट को बदला अवसर में: ₹2,000 से आत्मनिर्भरता का सफर
कोरोना काल में जब पारिवारिक और आर्थिक परिस्थितियाँ कठिन थीं, तब कविता जी ने अपने भीतर के अटूट संकल्प को जगाया। अपनी मेहनत, लगन और कुछ नया सीखने की निरंतर इच्छा के बल पर उन्होंने कदम आगे बढ़ाए। आज वे किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं, बल्कि तीन अलग-अलग विधाओं में अपनी कला और व्यावसायिक कुशलता का लोहा मनवा रही हैं:
- रेशम (Silk) पेंटिंग: रेशमी धागों और कपड़ों पर कला के बेहतरीन रंग उकेरना, जिसे राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिल रही है।
- ऐपण (Aipan) पेंटिंग: उत्तराखंड की पारंपरिक और लोक सांस्कृतिक धरोहर ‘ऐपण’ को आधुनिक बाज़ार के उत्पादों से जोड़कर उसे सहेजने का काम।
- फूड प्रोसेसिंग (खाद्य प्रसंस्करण): पहाड़ के स्थानीय और शुद्ध कृषि उत्पादों का मूल्य संवर्धन (Value Addition) कर उन्हें नई पहचान दिलाना।
अकेले शुरू हुआ सफर, अब बना कारवां
कविता जी की सफलता केवल उनकी व्यक्तिगत तरक्की तक सीमित नहीं है। आज उनके साथ पहाड़ की अनेक ग्रामीण महिलाएँ और कई स्वयं सहायता समूह (SHGs) कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे हैं। कविता जी कहती हैं:
“मेरे साथ जुड़ी महिलाओं की उम्मीदें और उनका विश्वास ही मेरी सबसे बड़ी प्रेरणा हैं। यदि महिलाओं को दृढ़ संकल्प और सही दिशा मिले, तो एक छोटी सी शुरुआत भी समाज में बहुत बड़ा बदलाव ला सकती है।”
वे इन महिलाओं को केवल रोज़गार नहीं दे रही हैं, बल्कि उन्हें सही मार्गदर्शन, कौशल विकास (Skill Development) का प्रशिक्षण और नए बाज़ारों से जोड़कर पूरी तरह आत्मनिर्भर बना रही हैं ताकि वे भी अपने परिवार के विकास में सम्मानजनक भूमिका निभा सकें।
सराहना, सम्मान और भविष्य का संकल्प
कविता जी के इन निस्वार्थ प्रयासों को विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और नेतृत्व मंचों पर न केवल सराहा गया है, बल्कि उन्हें प्रतिष्ठित सम्मानों से भी नवाजा गया है। उनका दृढ़ विश्वास है कि यदि किसी महिला को सही दिशा और अवसर मिले, तो वह न केवल अपना बल्कि पूरे समाज का भाग्य बदल सकती है।
भविष्य का लक्ष्य: कविता बिष्ट ऐरी जी का अगला कदम अपने इस कार्य को और अधिक व्यापक बनाना है। वे उत्तराखंड के दूरदराज के क्षेत्रों तक पहुँचकर अधिक से अधिक युवाओं और महिलाओं को स्वरोज़गार से जोड़ना चाहती हैं, ताकि ‘एक कदम पहाड़ की ओर’ बढ़ते हुए यहाँ के पारंपरिक उत्पादों को वैश्विक पहचान मिल सके।





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