उत्तराखंड के जंगलों को दहलाने वाली ‘चीड़ की पत्तियाँ’ (पिरूल) अब अभिशाप नहीं, बल्कि आजीविका का जरिया बन चुकी हैं। यह बदलाव मुमकिन हुआ है मंजू रौतेला साह के अथक प्रयासों से, जिन्हें आज पूरी दुनिया ‘पिरूल वुमेन’ के नाम से जानती है।
जब कचरा बना कुबेर का खजाना
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में चीड़ के पेड़ों से झड़ने वाली पत्तियाँ, जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘पिरूल’ कहा जाता है, दशकों तक वन विभाग और ग्रामीणों के लिए सिरदर्द बनी रहीं। ये पत्तियाँ न केवल फिसलन का कारण थीं, बल्कि जंगलों में लगने वाली भीषण आग के लिए भी सबसे बड़ा ईंधन साबित होती थीं। लेकिन, बागेश्वर की बेटी और वर्तमान में अल्मोड़ा के द्वाराहाट में रहने वाली मंजू रौतेला साह ने इन पत्तियों में छिपे हुनर को पहचाना।
संघर्ष से सृजन तक का सफर
मंजू का जीवन किसी भी फिल्म की पटकथा से कम संघर्षपूर्ण नहीं है। मात्र तीसरी कक्षा में अपने पिता को खोने वाली मंजू ने कम उम्र में ही जिम्मेदारियों का बोझ उठाना सीख लिया था। उनकी शिक्षा बागेश्वर से हल्द्वानी और भीमताल तक रही। विवाह के बाद जब उन्होंने अपने गृहस्थ जीवन की शुरुआत की, तो उनकी मौसेरी बहन पूजा ने उन्हें ‘वेस्ट से बेस्ट’ बनाने की कला की ओर प्रेरित किया। वर्ष 2010 से शुरू हुआ यह सफर आज एक बड़े सामाजिक आंदोलन का रूप ले चुका है।
कला और पर्यावरण का संगम
मंजू केवल उत्पाद नहीं बनातीं, बल्कि वे एक पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) तैयार कर रही हैं। उनके द्वारा पिरूल से निर्मित:
- सजावट और दैनिक उपयोग: फूलदान, टोकरी, पूजा थाल, पेन स्टैंड, और डाइनिंग मैट।
- उपयोगी वस्तुएं: बैठने के आसन, पायदान और स्टाइलिश हैट।
- सांस्कृतिक प्रतीक: रक्षाबंधन के समय पिरूल से बनी अनोखी राखियाँ, जिनकी डिमांड देश-विदेश तक है।
- फैशन एक्सेसरीज़: पिरूल से बनी आकर्षक हैट, ईयर रिंग, पेंडेंट, अंगूठी और पर्स।
- आधुनिक उपयोग: टी कोस्टर और मोबाइल चार्जिंग पॉकेट।
सीमा से परे प्रेरणा
मंजू की सफलता का पैमाना केवल उनके अपने उत्पाद नहीं, बल्कि वे महिलाएं हैं जिन्हें उन्होंने प्रशिक्षित किया है। राजकीय बालिका इंटर कॉलेज, ताड़ीखेत में प्रयोगशाला सहायक के रूप में काम करते हुए उन्होंने छात्राओं और शिक्षिकाओं को इस हुनर से लैस किया। आज उनके नक्शे कदम पर चलकर उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि हिमाचल और झारखंड की महिलाएं भी स्वरोजगार का मार्ग अपना रही हैं।
उपलब्धियां और सम्मान
वर्ष 2019 में कोलकाता में आयोजित ‘इण्डिया इंटरनेशनल साइंस फेस्टिवल’ में ‘बेस्ट अपकमिंग आर्टिस्ट’ का अवार्ड पाकर उन्होंने सिद्ध कर दिया कि पहाड़ की प्रतिभा को सही दिशा मिले तो वह वैश्विक मंच पर चमक सकती है। उन्हें शिक्षा में शून्य निवेश नवाचार के लिए प्रशस्ति पत्र भी मिला है।
2026 – पीरूल वूमेन मंजू साह रौतेला को गौरादेवी सम्मान दिया गया।
निष्कर्ष: एक नई दिशा
मंजू रौतेला साह का संदेश स्पष्ट है—पलायन किसी समस्या का समाधान नहीं है। यदि हम अपने आसपास मौजूद संसाधनों का सही और नवाचारी तरीके से उपयोग करें, तो पहाड़ में भी अवसरों की कमी नहीं है। मंजू आज न केवल सैकड़ों महिलाओं की प्रेरणास्त्रोत हैं, बल्कि यह भी साबित कर रही हैं कि पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक समृद्धि को एक साथ साधा जा सकता है।
संपादक की कलम से:
राष्ट्रप्रभात के इस अंक में मंजू रौतेला साह की कहानी यह बताती है कि पहाड़ की समस्याएं हमें पलायन के लिए नहीं, बल्कि नवाचार (Innovation) के लिए आमंत्रित करती हैं। मंजू जी जैसी शख्सियतें साबित करती हैं कि यदि संकल्प अटल हो, तो चीड़ की सूखी पत्तियाँ भी सोने जैसी चमक बिखेर सकती हैं।





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